ओरण को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ घोषित करने के प्रस्ताव का विरोध:बोले- धार्मिक आयोजनों में आएगी बाधा, नागौर कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन

नागौर जिले के ग्राम गुढ़ा भगवानदास और गुढ़ा भगवानदास खुर्द के ग्रामीणों ने राज्य सरकार द्वारा ओरण भूमि को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (Deemed Forest) घोषित करने के प्रस्ताव पर कड़ा विरोध जताया है। इस संबंध में सोमवार को ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपकर इस निर्णय को वापस लेने की मांग की। आस्था और इतिहास पर संकट ग्रामीणों ने प्रशासन को बताया कि यह ओरण भूमि न केवल राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है, बल्कि इसका गहरा ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है। यह क्षेत्र श्रद्धेय श्री भगवानदास जी महाराज की स्मृति से जुड़ा है, जिन्होंने ‘मतीरे की राड़’ के ऐतिहासिक युद्ध में अपना बलिदान दिया था। यहां स्थित प्राचीन मंदिर और स्मारकों से हजारों लोगों की आस्था जुड़ी है। ग्रामीणों को भय है कि वन विभाग के नियंत्रण में जाने के बाद श्रद्धालुओं की आवाजाही पर प्रतिबंध लग जाएगा और धार्मिक उत्सवों के आयोजन में बाधा उत्पन्न होगी। जल स्रोतों के प्रबंधन की चिंता पर्यावरण और जल संरक्षण के दृष्टिकोण से भी ग्रामीणों ने अपनी चिंता व्यक्त की है। ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि इस ओरण क्षेत्र में 7-8 प्राचीन नाड़ीयां और जल स्रोत स्थित हैं, जो क्षेत्र के भूजल स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ पशुओं के लिए पानी का मुख्य स्रोत हैं। ग्रामीण सदियों से इन जल स्रोतों का प्रबंधन और रखरखाव स्वयं करते आ रहे हैं, जो अब सरकारी नियंत्रण में जाने से बाधित हो सकता है। पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रहार इसके अतिरिक्त, ग्रामीणों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यह भूमि स्थानीय समुदाय के लिए मुख्य चरागाह है। यदि इसे ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ बना दिया जाता है, तो कड़े नियमों के कारण पशुपालकों का प्रवेश वर्जित हो जाएगा, जिससे क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। सामुदायिक संरक्षण को प्राथमिकता देने की मांग ग्रामीणों का कहना है कि वे इस ओरण को ‘देव-वन’ मानकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वयं इसकी रक्षा करते आए हैं। उनके अनुसार, सरकारी नियंत्रण की तुलना में सामुदायिक संरक्षण अधिक प्रभावी साबित हुआ है। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से मांग की है कि संबंधित खसरा नंबरों को वन विभाग की सूची से बाहर रखा जाए और राजस्व रिकॉर्ड में ‘ओरण’ के रूप में ही यथास्थिति बनाए रखी जाए।

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