गुजरात में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के जालोर के शौर्य का जिक्र किया… तेरहवीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ पर फिर आक्रमण का दुस्साहस किया। कहते हैं, जालोर के रावल ने खिलजी सेनाओं से जमकर लोहा लिया इसके बाद चौदहवीं शताब्दी की शुरुआत में जूनागढ़ के राजा द्वारा फिर से सोमनाथ की प्रतिष्ठा संपन्न कर दी गई। मोदी के जिक्र के बाद लोगों में जालोर के रावल के बारे में उत्सुकता पैदा हो गई है। दैनिक भास्कर ने इतिहासविद् राजवीर सिंह चलकोई और जालोर के उपन्यासकार पुरुषोत्तम पोमल से बात कर इस वीरता की कहानी के बारे में जाना। उन्होंने बताया- मुठ्ठी भर सैनिकों के साथ जालोर के चौहान वंश के महाराजा कान्हड़देव और वीरम देव ने ऐसे युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया कि खिलजी और उसकी विशाल सेना हैरान रह गई। 7 साल (साल 1305 से 1312) लगातार जालोर ने खिलजी को सीमा के भीतर आने से रोके रखा। खिलजी की 50 हजार की सेना के सामने जालोर के 5 हजार सैनिक थे। युद्ध करते हुए महाराजा राव कान्हड़देव और उनके बेटे वीरम देव शहीद हो गए। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… सन 1026 में सबसे पहले गजनी ने सोमनाथ मंदिर तोड़ा। बारहवीं शताब्दी में गुजरात के राजा कुमारपाल ने मंदिर का जीर्णोद्धार कर इसे वैसा ही भव्य बना दिया। 12वीं शताब्दी के अंत में खिलजी की फौज ने वाघेला राजवंश के राजा कर्णदेव को हराकर सोमनाथ मंदिर पर फिर आक्रमण का कर दिया। सोमनाथ मंदिर को क्षतिग्रस्त करने की सूचना से जालोर के राजा कान्हड़देव दुखी हो गए। खिलजी जालोर की सीमा से होते हुए निकलना चाह रहा था। खिलजी ने पत्र लिखकर कान्हड़देव से रास्ता देने का आग्रह किया। बदले में एक राशि व सम्मान देने का वादा भी किया। कान्हड़देव को ये मंजूर नहीं था। कान्हड़देव बोले- दमन करने वालों को रास्ता देना धर्म नहीं कान्हड़देव ने खिलजी के पत्र के जवाब में पत्र लिखा- जो मंदिर, महिला, ब्राह्मण, गाय आदि का दमन करे, ऐसों को रास्ता देना धर्म नहीं है। खिलजी की सेना जहां से निकलती है, वहां रास्तों पर आग लगा देती है और विष घोल देती है। निकलने के लिए रास्ता नहीं दे सकते। खिलजी को ये जवाब नागवार गुजरा। उसने सेना जालोर की ओर भेज दी। गुजरात में मार-काट मचाने वाले सेनापति उलुग खान को जालोर पर आक्रमण का आदेश दिया। उलुग खान ने गुजरात से लौटते समय 50 हजार सैनिकों के साथ कान्हड़देव के राज्य के सिवाणा दुर्ग (स्थानीय भाषा में गढ़ सिवाणा या सकराणा दुर्ग भी कहा जाता है) पर हमला बोल दिया। उलुग को अंदाजा नहीं था कि यहां इतना भारी प्रतिरोध सहना पड़ेगा। जैता देवड़ा के नेतृत्व में दुर्ग की 5 हजार की सेना ने मजबूती से जवाब दिया। तीव्र आक्रमण के कारण खिलजी की सेना को वापस भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। खिलजी सेना से सोमनाथ के मंदिर के शिवलिंग के टुकड़े छीने इतिहासकारों के अनुसार, जैता ने उलुग खान से सोमनाथ मंदिर की शिवलिंग के टुकड़े भी छीन लिए। इसके बाद इन टुकड़ों से कई जगह शिव मंदिर भी बनाए गए। सन 1308 से पहले एक बार फिर सिवाणा पर खिलजी सेना ने हमला किया। कान्हड़देव के दो वीर भतीजों सातल देव सोनगरा और सोमदेव सोनगरा ने वीरता से खिलजी की सेना से लड़े। दोनों वीरगति को प्राप्त हो गए। सिवाणा पर खिलजी का कब्जा हो गया। इसके बाद खिलजी की सेना ने भीनमाल, सांचौर में मंदिरों, शिक्षा स्थलों को तोड़ा। जालोर के पास खुड़ाला में कान्हड़देव की सेना ने फिर खिलजी सेना से युद्ध किया और भारी नुकसान पहुंचाया। यहां से खिलजी की सेना को हार कर भागना पड़ा। वहीं, नागौर में मालखाना नामक स्थान पर कान्हड़देव के बेटे वीरम देव सोनगरा ने खिलजी सेना को हराया। खिलजी के सेनापति श्मशखान और उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया था। खिलजी ने बुलावा भेजा, कान्हड़देव ने समझौता नहीं किया कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सन 1308 में खिलजी ने कान्हड़देव से मिलने का न्योता दिया। कान्हड़देव दरबार पहुंचे। कहते हैं कि दरबार में खिलजी हिन्दुओं का अपमान करने लगा। कान्हड़देव ने खिलजी से कहा- आपकी चुनौती मुझे स्वीकार है, युद्ध में मिलेंगे। सन 1311 में अलाउद्दीन ने दरबार में कान्हड़देव के कड़वे बोल का बदला लेने सेना भेज दी। खिलजी की सेना के निकलने की सूचना कान्हड़देव को मिली। खिलजी सेना के जालोर सीमा पर पहुंचने से पहले कान्हड़देव की सेना भी तैयार थी। जालोर की सेना की तैयारी के चलते कई जगह खिलजी सेना को युद्ध छोड़कर जान बचाते भागना पड़ा। ये संघर्ष करीब 3 साल तक चलता रहा। खिलजी को उसकी सेना के बार-बार हार की जानकारी मिलती रही। इसके बाद खिलजी ने सबसे वीर सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में शक्तिशाली सेना भेज दी। इस सेना का सामना सिवाणा के सामंत शीतल देव ने किया। शीतल देव के नेतृत्व में ऐसा युद्ध हुआ कि गुर्ग और उसकी सेना को भागना पड़ गया। खिलजी धोखे से अंदर घुसा खिलजी खुद की सेना की लगातार शर्मनाक हार से परेशान हो उठा था। सन 1312 में खुद 50 हजार से ज्यादा संख्या वाली सेना के साथ जालोर पहुंच गया। खिलजी ने युद्ध के बजाय छल का सहारा लिया। उसने जालोर की मजबूती-कमजोरी वाली जानकारी रखने वाले चौकीदार विका को पैसों-गहनों का लालच दिया। उसने गद्दारी की और गुप्त रास्ता बताने के साथ धोखे से किले का दरवाजा तक खोल दिया। बताया जाता है कि जब विका गहने-पैसों को लेकर अपने घर गया, तो उसकी पत्नी हीरा देवी काफी दुखी और नाराज हुई। हीरा देवी ने विका से कहा कि मैं गद्दार की पत्नी नहीं कहलाना चाहती, हीरादेवी ने विका का वध कर दिया। खिलजी की सेना भीतर घुस चुकी थी। कान्हड़देव ने अपने बेटे वीरम देव के साथ बहादुरी से लड़ाई लड़ी। उसके मुट्ठी भर सैनिकों ने खिलजी की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। दगाबाजी के चलते हार हुई, लेकिन कान्हड़देव जीते जी समर्पण करना नहीं चाहते थे। वे बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। कान्हड़देव के बेटे वीरमदेव को राजा बनाया गया। पराक्रम के साथ लड़ते हुए वीरम देव भी शहीद हो गए। खिलजी सेना ने जालोर पर कब्जा कर लिया। युद्ध का एक पक्ष और : खिलजी की बेटी का वीरमदेव से प्यार इतिहासकार मुहणोत नैणसी अपनी पुस्तक ‘नैणसी री ख्यात’ में लिखते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी की बेटी फिरोजा जालोर के राजकुमार वीरमदेव से प्यार करती थी। अलाउद्दीन भी फिरोजा की शादी वीरमदेव से करवाना चाहता था। शादी के प्रस्ताव को वीरमदेव मना कर देते हैं। वीरमदेव ने कहा- यदि मैं तुर्क राजा की कन्या से विवाह करता हूं, तो यह उसी प्रकार से असंभव है, जैसे सूर्य का पश्चिम से उदय होना। यदि ये शादी होती है, तो मेरा खुद का चौहाण वंश और मेरे ननिहाल का भाटि वंश दोनों लज्जित हो जाएंगे। इससे अलाउद्दीन के अहंकार को झटका लगा। युद्ध का एक कारण ये भी माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वी राज चौहान की मृत्यु के बाद एक शाखा ने रणथम्भौर में जाकर शासन किया और एक शाखा नाडौल गई। नाडौली वाली शाखा ही जालोर में पहुंची और शासन किया। पृथ्वीराज चौहान का वंशज कीर्तिपाल जालोर में नये राजवंश की स्थापना की, जिसमें कई शासकों के बाद कान्हड़देव शासक बने थे। …. पीएम मोदी के गुजरात दौरे से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… PM नरेंद्र मोदी ने उड़ाई राजस्थान के कलाकार की पतंग:उदयपुर में तैयार हुई खास ‘ट्रेन काइट’; ऑपरेशन सिंदूर का संदेश दिया मकर संक्रांति के मौके पर राजस्थान के कलाकार प्रवीण कुमार की बनाई खास ‘ट्रेन काइट’ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उड़ाया। इस अनोखी पतंग के जरिए ऑपरेशन सिंदूर और नारी सशक्तिकरण का संदेश दिया गया। पूरी खबर पढ़िए…


