मोबाइल स्क्रीन पर दिख रही हर चीज बच्चों को रियल लगने लगी है और वही उनकी डिमांड बनती जा रही है। महंगे गैजेट्स, ब्रांडेड कपड़े, ट्रेंडी खिलौने, गेमिंग सेटअप, बाहर खाने-घूमने की चाह और परफेक्ट लाइफस्टाइल की तस्वीरें बच्चों के दिमाग में यह भर रही हैं कि जो रील में दिख रहा है, वही सामान्य है। शहर के पेरेंट्स, टीचर्स और चाइल्ड काउंसलर्स मानते हैं कि यही सोच बच्चों में असंतोष, गुस्सा और आक्रामक व्यवहार को जन्म दे रही है। जब पेरेंट्स हर डिमांड पूरी नहीं कर पाते, तो बच्चे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं और प्रतिक्रिया के तौर पर चिड़चिड़ापन, जिद और गुस्सा दिखाने लगते हैं। ऐसे केस लगातार बढ़ रहे हैं, जहां बच्चे छोटी-छोटी बातों पर भड़क जाते हैं। रील और रियल के फर्क को न समझ पाने की यह स्थिति बच्चों के मानसिक संतुलन को बिगाड़ रही है। एक्सपर्ट्स के अनुसार सोशल मीडिया बच्चों को लगातार तुलना की स्थिति में डाल रहा है, जहां वे अपनी जिंदगी को कमतर समझने लगते हैं। रील और रियल का फर्क समझाना जरूरी सोशल मीडिया बच्चों को एक नकली दुनिया दिखा रहा है, जहां सब कुछ आसान, परफेक्ट और तुरंत मिलने वाला लगता है। बच्चे यह नहीं समझ पाते कि रील वर्ल्ड एडिटेड और प्लान्ड होती है। जब रियल लाइफ में वैसा नहीं होता, तो निराशा और गुस्सा बढ़ता है। लगातार स्क्रीन एक्सपोजर बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर बना रहा है। नींद की कमी और तुलना की आदत उनके व्यवहार को आक्रामक बना रही है। पेरेंट्स को बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि हर देखी चीज जरूरत नहीं होती और हर रील सच नहीं होती। बच्चों के स्क्रीन टाइम पर कंट्रोल, तय रूटीन, खेलकूद और परिवार के साथ समय सबसे बड़ी जरूरत है। डिमांड को सीधे नकारने की बजाय कारण समझाएं, विकल्प दें। अगर बच्चा गुस्सा करता है, खुद को दूसरों से कम समझे या व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, तो इसे नजरअंदाज न करें। सही मार्गदर्शन और समझदारी से ही रील वर्ल्ड के असर से बच्चों को बचाया जा सकता है। रितु कपूर, चाइल्ड काउंसलर केस 1: रील में देखा महंगा फोन, नहीं मिला तो टूटा कंट्रोल : 11 साल के एक बच्चे ने सोशल मीडिया पर गेमिंग वीडियो देखकर नया मोबाइल फोन मांगना शुरू किया। मना करने पर बच्चा गुस्सा दिखाने लगा। मां बताती हैं कि पिछले कुछ महीनों में उसकी जिद और गुस्सा तेजी से बढ़ा। काउंसलिंग में सामने आया कि बच्चा रोज घंटों रील्स में महंगे फोन और लग्जरी लाइफ देखकर उसे रियल लाइफ मानने लगा था। केस 2: हर चीज तुरंत चाहिए, इंतजार की आदत खत्म : 9 साल के बच्चे के पिता बताते हैं कि स्कूल से भी शिकायत आई कि बच्चा बात-बात पर नाराज हो जाता है और दूसरों से बहस करता है। जांच में पता चला कि बच्चा सोशल मीडिया कंटेंट से इतना प्रभावित है कि उसे रियल लाइफ की सीमाएं स्वीकार ही नहीं हो रहीं। केस 3: रील जैसा बर्थडे नहीं तो निराशा और गुस्सा : 10 साल की बच्ची ने सोशल मीडिया पर ग्रैंड बर्थडे सेलिब्रेशन देखकर वैसा ही जन्मदिन मनाने की जिद की। साधारण पार्टी की बात पर वह उदास हो गई और कहने लगी कि उसका बर्थडे दूसरों जैसा खास नहीं है। पेरेंट्स बताते हैं कि बच्ची ने खुद को कमरे में बंद कर लिया।


