शहडोल में आज से से बाणगंगा मेला शुरू हो गया है, जो 20 जनवरी तक चलेगा। यह मेला धार्मिक आस्था, संस्कृति और इतिहास का संगम है, जहां हर साल मकर संक्रांति पर हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मेले की शुरुआत 1895 में तत्कालीन रीवा महाराजा गुलाब सिंह ने की थी। यह परंपरा तब से लगातार जारी है। क्षेत्र में स्थित बाणगंगा कुंड को धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह कुंड महाभारत काल में अर्जुन ने अपने बाण से बनाया था। कुंड का पवित्र जल चमत्कारी गुणों से युक्त श्रद्धालुओं का मानना है कि इस कुंड का पवित्र जल चमत्कारी गुणों से युक्त है। इसमें स्नान करने से पुण्य मिलता है और कई लोग इसका पानी अपने घर भी ले जाते हैं। कहा जाता है कि इसी कुंड के कारण इस क्षेत्र का नाम बाणगंगा पड़ा, जहां बाण और गंगा का मिलन धार्मिक आस्था का प्रतीक है। बाणगंगा परिसर में प्राचीन विराट मंदिर, शिवजी का मंदिर और कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं, जो इस स्थान के पुरातात्विक और धार्मिक महत्व को बढ़ाती हैं। बाणगंगा मेला जिले की सांस्कृतिक पहचान बाणगंगा मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह शहडोल जिले की सांस्कृतिक पहचान भी बन गया है। मेला अवधि के दौरान स्थानीय कलाकार भजन-कीर्तन, लोक-संगीत और नृत्य प्रस्तुत करते हैं। मेले में उमड़ने वाली भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने 14 से 20 जनवरी तक विशेष यातायात प्रबंधन और डायवर्जन प्लान लागू किया है। इसका उद्देश्य भीड़भाड़ और जाम की समस्याओं से बचना है। भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए डायवर्जन किया उमरिया/रीवा से अनूपपुर की ओर जाने वाली बसें चंदनिया बैरियर से नया बायपास, राजाबाग चौक, थाना सोहागपुर, मेडिकल कॉलेज चौराहा, कुदरी रोड/किया तिराहा होते हुए नए बस स्टैंड शहडोल पहुंचेंगी। इसी तरह, अनूपपुर से उमरिया/रीवा जाने वाली बसें न्यू बस स्टैंड से कुदरी रोड/किया तिराहा, नया बायपास, मेडिकल कॉलेज चौराहा, थाना सोहागपुर, राजाबाग चौक होते हुए चंदनिया बैरियर/रीवा रोड की ओर जाएंगी। प्रशासन ने सूचित किया है कि मेले के दौरान नया बस स्टैंड से पुराने बायपास (बाणगंगा तिराहा) मार्ग का उपयोग किसी भी वाहन की ओर से नहीं किया जाएगा।


