भास्कर न्यूज | धालभूमगढ़ धालभूमगढ़ प्रखंड के नरसिंहगढ़ में मकर संक्रांति के दिन खेले जाने वाले नारियल लड़ाई के खेल की परंपरा राजाओं के जमाने से चली आ रही है। यह अनोखा खेल आज भी हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ आयोजित होता है। समय के साथ यह परंपरा केवल एक खेल नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और धरोहर बन चुकी है। मकर संक्रांति के दिन नरसिंहगढ़ बाजार में विशेष रौनक देखने को मिलती है। बड़ी संख्या में लोग इस खेल में भाग लेने के लिए बाजार पहुंचते हैं। खास तौर पर मजबूत और टिकाऊ नारियल की मांग इस दिन अचानक बढ़ जाती है, जिससे नारियल की बिक्री में जबरदस्त उछाल आता है। दुकानदारों के लिए यह दिन खास मायने रखता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, नरसिंहगढ़ के राजाओं ने इस नारियल खेल की शुरुआत मकर संक्रांति के पर्व से जोड़कर की थी। तभी से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। राजाओं के समय जिस उत्साह और जोश के साथ यह खेल खेला जाता था, आज भी लोगों में वही उत्सुकता देखने को मिलती है। ऐसे होता है नारियल लड़ाई का खेल : इस खेल में दो खिलाड़ी अपने-अपने हाथों में नारियल लेकर आमने-सामने खड़े होते हैं। फिर दोनों नारियल को आपस में टकराया जाता है। जिसका नारियल टूट या फट जाता है, वह हार जाता है। हारने वाले को अपना फटा हुआ नारियल जीतने वाले को देना पड़ता है। इस सरल लेकिन रोमांचक खेल में युवाओं की भागीदारी सबसे अधिक रहती है। नारियल लड़ाई का खेल सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से लोगों के बीच आपसी मेल-जोल, हंसी-खुशी और भाईचारे का माहौल बनता है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं दर्शक के रूप में इस खेल का भरपूर आनंद लेते हैं। राजाओं के जमाने से चली आ रही यह परंपरा आज भी अपनी प्रासंगिकता और महत्व बनाए हुए है। यह खेल न केवल नरसिंहगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को संजोए हुए है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक लोकपरंपराओं को पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी बन रहा है।


