हाई कोर्ट का फैसला…:आधार व वोटर आईडी किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं माने जा सकते

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड और वोटर आईडी किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माने जा सकते। ये दस्तावेज स्व-घोषणा के आधार पर बनाए जाते हैं और केवल पहचान के उद्देश्य से होते हैं। यह टिप्पणी जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने की है। अतिरिक्त कलेक्टर (धार) के आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई थी। अतिरिक्त कलेक्टर ने आंगनवाड़ी सहायिका हिर्लीबाई की सेवानिवृत्ति को गलत मानते हुए उन्हें पुनः बहाल कर दिया था। चूंकि पद एक ही स्वीकृत था, इसलिए वर्तमान पदस्थ सहायिका को सेवा से हटा दिया गया था। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग की नीति के अनुसार चयन प्रक्रिया पूरी कर जून 2018 में उनकी नियुक्ति की गई थी। इससे पहले वही पद हिर्लीबाई के पास था, जिन्हें सेवा अभिलेख में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर 62 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर 5 मार्च 2017 को सेवानिवृत्त कर दिया गया था। इस आदेश को उस समय कभी चुनौती नहीं दी गई। करीब दो साल बाद हिर्लीबाई ने अपील दायर कर दावा किया कि उनकी जन्मतिथि 5 मार्च 1955 नहीं, बल्कि 1 जनवरी 1964 है, जिसका आधार उन्होंने आधार कार्ड और वोटर आईडी को बताया। याचिकाकर्ता को सुनवाई का मौका नहीं दिया, जो न्याय सिद्धांत का उल्लंघन हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा अभिलेख में दर्ज जन्मतिथि को स्वीकार कर लेने और रिटायरमेंट के बाद उसे चुनौती देना सेवा कानून के विपरीत है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अपीलीय प्राधिकारी ने देरी और लैचेस (Delay Laches) के सिद्धांत की अनदेखी की, जो घातक है। कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता (प्रमिला) को बिना सुनवाई का अवसर दिए सेवा से हटाया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है। इन कारणों से हाईकोर्ट ने अपीलीय आदेश और याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर पुनः बहाल करने के निर्देश दिए।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *