राजधानी में बीते 48 घंटे के भीतर 11 से अधिक अवैध कॉलोनियों पर एफआईआर दर्ज कराई जा चुकी है। जबकि गुरुवार को 12 नई कॉलोनियों पर केस दर्ज कराने के लिए दस्तावेज जुटाए गए। देर शाम तक एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी, लेकिन प्रशासन को उम्मीद है कि शुक्रवार-शनिवार तक ये प्रकरण भी दर्ज हो जाएंगे। कलेक्टर की सख्ती के बाद अब अवैध कॉलोनियों में सड़क, बाउंड्रीवॉल सहित अन्य निर्माण तोड़ने के लिए पुलिस बल की मांग की गई है। प्रशासन ने 113 कॉलोनी की लिस्ट बनाई है। हालांकि, इस अभियान के तहत जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है, उनमें से अधिकांश किसान हैं, जबकि कॉलोनी काटने वाले लोग अलग हैं। दस्तावेजों में कॉलोनाइजरों के नाम नहीं होने के कारण प्रशासन का शिकंजा जमीन मालिक किसानों पर ही कस रहा है। लेकिन, सवाल है कि अवैध कॉलोनी काटने वालों पर केस क्यों नहीं हो रहे? लेकिन, पहले की जमीनों का अधिग्रहण नहीं हुआ
पिछले साल जिला प्रशासन ने दावा किया था कि अवैध कॉलोनियों की सुनवाई के बाद जमीनों का अधिग्रहण कर कॉलोनाइजरों पर एफआईआर दर्ज की जाएगी। बची जमीनों को बेचकर कॉलोनी का विकास किया जाएगा। लेकिन, हकीकत यह है कि आज तक न तो किसी जमीन का अधिग्रहण हुआ और न ही किसी कॉलोनी का विकास। 294 एफआईआर दर्ज होने के बावजूद ज्यादातर मामलों में अब तक ठोस नतीजे सामने नहीं आए हैं। तो कॉलोनाइजर बच निकलते
हकीकत यह है कि कॉलोनी काटने वाले लोग जमीन अपने नाम पर नहीं कराते। वे एग्रीमेंट के आधार पर पूरा कारोबार करते हैं और रजिस्ट्री किसान के नाम ही रहती है। मोटे मुनाफे के लालच में कई किसान इस प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं, लेकिन जब कार्रवाई होती है तो कॉलोनाइजर बच निकलते हैं और जमीन मालिक किसान ही कानूनी पचड़े में फंस जाते हैं। इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही सामने आए हैं। राजनीतिक रसूख से कार्रवाई नहीं
राजधानी में शायद ही कोई इलाका हो जहां अवैध कॉलोनियों का जाल न फैला हो। प्रशासन एफआईआर तो दर्ज कराता है, लेकिन राजनीतिक रसूख के चलते कई मामलों में ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती। यही कारण है कि सस्ती कृषि भूमि पर प्लॉटिंग कर ऊंचे दामों पर बिक्री का खेल लगातार जारी है। इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा नुकसान आम खरीदार को उठाना पड़ता है। बिना वारंट कार्रवाई हो सकती है… मप्र पंचायत राज, ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 61-घ(3) अवैध कॉलोनी निर्माण और गैरकानूनी भूमि डायवर्जन से जुड़ी है। इसमें दोषी को 3 से 7 साल कारावास और न्यूनतम 10 हजार रुपए जुर्माना होगा। यह संज्ञेय अपराध है, पुलिस बिना वारंट कार्रवाई कर सकती है।


