गीतकार-स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर ने कहा:उर्दू ने पाक के टुकड़े करवाए, भारत में उर्दू को अपना मानने वाले ही तनाव बनाते हैं

‘उर्दू जुबान ने पाकिस्तान के टुकड़े करवाए। भारत में बसे जो लोग उर्दू को ही अपना मानते हैं, वो तनाव बनाकर रखते हैं। भाषा कभी धर्म या समाज की हो ही नहीं सकती। भाषा रीजन की होती है, रिलीजन की नहीं।’ यह बात गुरुवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) के पहले दिन गीतकार जावेद अख्तर ने ‘इंडिया इन उर्दू: उर्दू इन इंडिया’ सेशन में कही। वहीं, ‘जावेद अख्तर: पॉइंट्स ऑफ व्यू’ सेशन में उनके साथ राइटर वरीशा फरासत ने चर्चा की। जावेद ने कहा कि सेक्युलरिज्म का कोई क्रैश कोर्स नहीं होता। सेक्युलरिज्म हमें आसपास के माहौल से मिलता है। मुझे यह सब नाना-नानी से मिला। ऑडियंस से सवाल आया कि उर्दू ज्यादा पुरानी है या संस्कृत। इस पर उन्होंने कहा- संस्कृत पहले आई या उर्दू, ये सवाल ही गलत है। संस्कृत हजारों साल पुरानी है। उर्दू तो कल की बच्ची है। तमिल सबसे पुरानी जिंदा भाषा है। उर्दू इस रेस में शामिल ही नहीं है। उन्होंने कहा अक्सर सोचता हूं कि इस उम्र में मुझे अपनी पोतियों के बारे में बात करनी चाहिए। जब मुझसे मेरी मां के बारे में पूछा जाता है, तो मैं खुद को बचपन में पाता हूं। मैंने 8 साल की उम्र में मां को खो दिया। मां ने मुझे भाषा से खेलना सिखाया। शब्द समझना, उन्हें वाक्य में रखना। ये सब घर के भीतर खेल-खेल में हुआ। बिना भेदभाव के पढ़ना जरूरी… जहां तक युवाओं को सलाह देने की बात है, मैं ज्यादा सलाह देने में विश्वास नहीं करता। दुनिया आपकी है। बस एक बात कहूंगा- लिखने से पहले पढ़ना जरूरी है। बिना भेदभाव पढ़िए। यह मत सोचिए कि इससे मुझे क्या फायदा होगा। पढ़ना अपने आप में लाभ है। कम्युनलिज्म पर मेरी साफ राय है, किसी भी समुदाय को एक रंग में रंगना बुनियादी गलती है। हर शहर, हर देश, हर समुदाय में हर तरह के लोग होते हैं। इतिहास को भी हमेशा संदेह के साथ पढ़िए, क्योंकि सत्ता का पहला उद्देश्य सत्ता बचाना होता है-सच नहीं। मेरे घर में धर्म कभी थोपा नहीं गया मैं ऐसे परिवार में पैदा हुआ, जहां कुछ लोग आस्तिक थे, कुछ नास्तिक और कुछ एग्नोस्टिक (ईश्वर के अस्तित्व के बारे में निश्चित नहीं होते)। धर्म कभी थोपा नहीं गया। मेरी नानी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, अपना नाम तक नहीं लिख सकती थीं, लेकिन उनमें जो संवेदनशीलता थी वो काश आज के कई पढ़े-लिखे लोगों में होती। उन्होंने एक बार मेरे नाना को रोका, जब वे मुझे कुरान की आयतें याद करवा रहे थे। उन्होंने साफ कहा, ‘हमें इसे कुछ भी थोपने का हक नहीं है।’ वहीं मेरी धार्मिक शिक्षा समाप्त हो गई।

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