राजस्थान में 29 जनवरी से 18 फरवरी तक सेना भर्ती का आयोजन किया जाएगा। बीकानेर संभाग में हो रही इस भर्ती में शामिल होने के लिए युवाओं ने तैयारियां शुरू कर दी है। अभी से आर्मी का जोश और जुनून साफ दिखाई दे रहा है। सेना में सबसे जरूरी है अनुशासन और इसी अनुशासन को युवा फॉलो कर रहे हैं। कोई कहता है ये मेरा आखिरी मौका है, जब सुबह 4 बजे उठने में दिक्कत आती है तो मां का चेहरा याद कर लेते हैं। कोई अपने दादा के सपने को लेकर आर्मी की ट्रेनिंग ले रहा है तो किसी का सपना सिर्फ आर्मी ही है। खुद से तैयारी करने वालों ने खेतों में दौड़ने के ट्रैक बना लिए हैं तो किसी ने गांव की पगडंडियों को दौड़-दौड़ कर ट्रैक में तब्दील कर दिया है। पढ़िए झुंझुनूं के युवाओं का आर्मी में जाने का जुनून…. घर तभी जाऊंगा जब वर्दी होगी चूरू के रहने वाले लक्की बताते हैं- दो साल हो गए हैं घर गए हुए। यह मेरा लास्ट चांस है। सुबह 4 बजे उठकर जब हड्डियां कंपाने वाली ठंड में दौड़ते हैं, तो बस मां का चेहरा याद आता है। उनको मुझसे बहुत उम्मीदें हैं। इस बार सिलेक्शन लेकर ही लौटूंगा। डिसिप्लिन ही आर्मी की ताकत चूरू के ही फयाज खान बताते हैं कि डिसिप्लिन ही आर्मी की सबसे बड़ी ताकत है। हमें सबसे पहले खुद को अनुशासन में रखने का प्रयास करना होता है। ऐसे में हम एकेडमी में फौजी बनने के लिए सुबह जल्दी उठने से लेकर खेल में अनुशासन सीखने का प्रयास करते हैं। दादा का सपना पूरा करना है हनुमानगढ़ (भादरा) के खालिद खान कहते हैं- मैं कायमखानी समाज से हूं। हमारे कायमखानी समाज के कई युवा फौज में हैं। जब कोई फौजी घर आता है तो दादाजी को लगता है कि हमारे परिवार से भी कोई न कोई आर्मी में जरूर होना चाहिए। उनका सपना है कि मैं एकेडमी से ट्रेनिंग लूं और आर्मी जॉइन करूं। खालिद कहते हैं- कभी घर में खुद के कपड़े नहीं धोए थे, आज सब खुद करना पड़ता है। खाने की तकलीफ भी होती है, लेकिन आर्मी का जुनून सब सिखा देता है। आर्मी नहीं तो नेवी में ट्राई करूंगा झुंझुनूं के राहुल का जज्बा भी कुछ ऐसा ही है। एक चांस गंवा चुके राहुल के लिए यह ‘करो या मरो’ वाली स्थिति है। वे कहते हैं- पहली प्राथमिकता आर्मी है, उसके बाद नेवी। इसके बाद भी अगर मौका नहीं मिलता तो देखेंगे कि लाइफ कहां ले जाती है। लेकिन, इस बार पूरा प्रयास रहेगा कि आर्मी सिलेक्शन हो ही जाए। गांवों की पगडंडियों से स्टेडियम तक का सफर भर्ती की तारीख आते ही झुंझुनूं का केवल स्वर्ण जयंती स्टेडियम ही नहीं, बल्कि बुहाना, सूरजगढ़, खेतड़ी, पिलानी और नवलगढ़ के गांवों के खेतों में भी ट्रैक बन गए हैं। जहां पक्का ट्रैक नहीं है, वहां युवाओं ने खेतों की मेढ़ और कच्ची सड़कों को ही अपना प्रैक्टिस ग्राउंड बना लिया है। ट्रेनर महेंद्र गुर्जर कहते हैं शेखावाटी की मिट्टी में ही देशभक्ति है। उन्होंने सेना में भर्ती होने वाले युवाओं को सलाह भी दी है। वो कहते हैं- युवाओं को इस वक्त चोट से बचना चाहिए और अपने दस्तावेजों (मूल निवास, जाति प्रमाण पत्र) को दुरुस्त रखना चाहिए।


