जहां महिलाएं थीं निर्णायक, अब सश​क्तीकरण की विरासत बचाने की जंग

गोलक | सरायकेला खरकाई नदी की गोद में बसी मिरगीचिंगडा सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वह मंच रहा है जहां सदियों पहले महिला सशक्तीकरण की जीवंत मिसाल देखने को मिलती थी। मकर संक्रांति के बाद प्रत्येक शनिवार को लगने वाली ऐतिहासिक महिला मेला अपने आप में अनूठी थी, जहां निर्णय, व्यापार और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की बागडोर पूरी तरह महिलाओं के हाथों में रहती थी। उस दौर में जब समाज में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी। मिरगीचिंगडा की यह परंपरा सामाजिक चेतना से कहीं आगे की सोच को दर्शाती थी। इस मेले में महिलाएं न केवल खरीद-बिक्री करती थीं, बल्कि लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों के माध्यम से अपनी संस्कृति और आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन भी करती थीं। यह मेला महिलाओं के लिए सामाजिक संवाद, आत्मविश्वास और सामूहिक शक्ति का केंद्र हुआ करता था, जिसे आज के संदर्भ में महिला सशक्तीकरण की प्रारंभिक अवधारणा कहा जा सकता है। लेकिन समय के साथ इस ऐतिहासिक मंच की पहचान धूमिल होती चली गई। महिलाओं के लिए समर्पित इस मेले में पुरुषों की बढ़ती भागीदारी ने इसकी मूल भावना को कमजोर कर दिया। अब यह मेला सामान्य मेले का स्वरूप लेने लगा है, जिससे महिलाओं की निर्णायक भूमिका सीमित होती जा रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि यह क्रम यूं ही चलता रहा, तो मिरगीचिंगडा की महिला मेला केवल नाम मात्र की परंपरा बनकर रह जाएगी। मिरगीचिंगडा का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व भी इसे विशेष बनाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों का इस क्षेत्र से गुजरना और नदी की चट्टानों पर उनके पैरों के निशान इस स्थान को आध्यात्मिक पहचान देते थे। दुर्भाग्यवश, ये ऐतिहासिक निशान आज लुप्त हो चुके हैं, जो संरक्षण के अभाव का ही परिणाम है। स्थानीय समाजसेवियों का मानना है कि यदि सरकार और समाज मिलकर इस मेले को पुनः महिलाओं के नेतृत्व में संगठित करे, तो यह आज भी महिला सशक्तीकरण का सशक्त मॉडल बन सकता है। मिरगीचिंगडा की महिला मेला को बचाना, दरअसल उस सोच को बचाना है, जहां महिलाएं केवल सहभागी नहीं, बल्कि समाज की दिशा तय करने वाली शक्ति थीं। उड़िया समाजसेवी कार्तिक परीक्षा सहित कई जागरूक नागरिकों ने मिरगीचिंगडा महिला मेला को महिला सशक्तीकरण की विरासत के रूप में संरक्षित करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यह मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक नेतृत्व और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

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