सिटी एंकर पश्चिमी राजस्थान में खाळों का निर्माण सालों पहले हुआ था। सेकंड स्टेज के ढाई लाख हेक्टेयर में डेढ़ लाख हेक्टेयर के खाळे पूरी तरह जर्जर हो गए हैं। इनकी मरम्मत के लिए करीब 2500 करोड़ रुपए की जरूरत हैं जिसमें से पिछले साल सरकार ने 880 करोड़ और लूणकरणसर के लिए 185 करोड़ रुपए दिए थे। अभी भी 1500 करोड़ और चाहिए। संभावना है कि आने वाले बजट में ये बजट भी मिल सकता है। खाळों की मरम्मत की जरूरत इसलिए है ताकि खेतों तक आसानी से पानी पहुंच सके। 50 साल पुराने खाळों को दुरुस्त कराने के लिए मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने पिछले बजट में 880 करोड़ रुपए दिए थे। इसमें करीब एक तिहाई खाळों की ही मरम्मत होनी है। क्योंकि एक हेक्टेयर में खाळा निर्माण की लागत करीब 30 हजार रुपए आती है। इन 880 करोड़ रुपए के टेंडर होकर वर्कआर्डर भी हो गए हैं। काम कुछ जगह शुरू हो गया तो कुछ जगह होने वाला है। 2023 में सीएम ने लूणकरणसर के लिए करीब 185 करोड़ रुपए दिए थे। वहां भी 25-25 करोड़ के पैकेज बनाए थे। वहां काम चल रहा है। यानी दो साल में तकरीबन 1000 करोड़ रुपए खाळों के लिए मिल चुके हैं मगर अभी भी 1500 करोड़ रुपए की जरूरत और है। कहा जा रहा है कि केन्द्र की मदद से आने वाले बजट में भी सरकार 1500 करोड़ में से एक हजार करोड़ रुपए और दे सकती है। अगर ऐसा हुआ तो करीब सवा लाख हेक्टेयर में खाळों की मरम्मत हो जाएगी। अगर ऐसा होता है तो सेकंड स्टेज के लगभग सभी खाळे दुरुस्त हो जाएंगे। बीकानेर की इन वितरिकाओं में बनेंगे खाळे : वैसे तो ज्यादातर वितरिकाओं में खाळों का निर्माण होना है। मगर बीकानेर में दंतौर वितरिका में 250 करोड, बरसलपुर ब्रांच में आरडी 114 आरडी से 156 तक 100 करोड, भूरासर वितरिका में 172 करोड़, चारणवाला ब्रांच में 142 करोड़ से काम होने लगे हैं। जैसलमेर में दो अलग-अलग टेंडर हुए हैं। एक टेंडर 135 करोड़ आैर एक 140 करोड़ का हुआ है। खाळों से फायदा : पश्चिमी राजस्थान जैसे रेतीले इलाके में जहाँ पानी की एक-एक बूंद कीमती है वहां खाळा बनाने या उसे पक्का करने के बहुत फायदे हैं। इससे पानी की बर्बादी में कमी होती है। रेतीली मिट्टी में कच्चे खाळों से पानी बहुत अधिक रिसता है। पक्के खाळे बनने से पानी जमीन के अंदर नहीं सोखता और पूरा पानी खेत तक पहुँचता है। पक्की सतह होने के कारण पानी का प्रवाह तेज होता है। इससे खेत तक पानी पहुँचने में समय कम लगता है जिससे किसान कम समय में अधिक क्षेत्र की सिंचाई कर सकता है। अक्सर कच्चे खाळों में पानी बीच में ही खत्म हो जाता था जिससे नहर से दूर वाले खेतों तक पानी नहीं पहुँच पाता था। पक्के खाळे सुनिश्चित करते हैं कि “टेल” (अंतिम छोर) पर स्थित किसान को भी उसके हक का पूरा पानी मिले।


