बालवाड़ी सिर्फ नाम की; भवन है न शौचालय, पहली कक्षा के साथ बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं नौनिहाल

भास्कर न्यूज | कवर्धा/कुकदूर नई शिक्षा नीति की सबसे अहम कड़ी मानी जाने वाली बालवाड़ी व्यवस्था जिले में कागजों तक सिमटकर रह गई है। 5 से 6 वर्ष के बच्चों को खेल-खेल में औपचारिक स्कूली शिक्षा के लिए तैयार करने के उद्देश्य से बालवाड़ी शुरू की गई है। लेकिन बालवाड़ी आज भवन, शौचालय, संसाधन और मानदेय चारों मोर्चों पर बदहाल नजर आ रही है। हालात इतने खराब हैं कि कई स्कूलों में नौनिहालों को पहली कक्षा के बच्चों के साथ बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। इससे बालवाड़ी की मूल अवधारणा ही दम तोड़ती दिख रही है। जिले में कुल 472 बालवाड़ी केंद्र संचालित हैं। यहां करीब 3 हजार बच्चे दर्ज हैं। तीन दिन पहले ही पंडरिया ब्लॉक के बालवाड़ी में कुर्सी-टेबल भेजे गए, लेकिन वह भी अधूरे और अपर्याप्त। ग्राम लखनपुर के प्राथमिक स्कूल में संचालित बालवाड़ी में दर्ज 15 बच्चों के लिए 15 कुर्सियां तो भेजे हैं, लेकिन टेबल 3 ही आई है। कुकदूर क्षेत्र के ग्राम लखनपुर की बालवाड़ी जिले की स्थिति की बानगी पेश करती है। यहां बालवाड़ी के लिए अलग भवन नहीं है। यहां तक कि बच्चों के लिए शौचालय तक उपलब्ध नहीं है। दो अतिरिक्त कमरों में ही पहली से 5वीं कक्षा और बालवाड़ी संचालित की जा रही है। स्कूल में केवल एक प्रधान पाठक और एक सहायक शिक्षक पदस्थ हैं, जबकि कुल 39 बच्चे दर्ज हैं। ऐसे हालात में खेल- खेल में सीखने की अवधारणा बेमानी साबित हो रही है। उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है। बालवाड़ी की शुरुआत 5 सितंबर 2022 को शिक्षक दिवस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की घोषणा के बाद हुई थी। योजना के तहत जिन परिसरों में आंगनबाड़ी और प्राथमिक स्कूल एक ही परिसर में संचालित हैं, वहां बालवाड़ी चलनी थी। नियम यह बनाया गया कि स्कूल के मध्याह्न भोजन से 2 घंटे पहले तक आंगनबाड़ी सहायिका और प्राथमिक स्कूल के सहायक शिक्षक- शिक्षिका की मदद से बालवाड़ी का संचालन होगा। इसके अलावा प्राथमिक शिक्षक को एक घंटे अतिरिक्त पढ़ाने का दायित्व सौंपा गया। बालवाड़ी संचालन के लिए शिक्षकों को 500 रुपए प्रतिमाह पारिश्रमिक तय किया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि बालवाड़ी शुरू होने के बाद से अब तक सिर्फ एक वर्ष 2022- 23 का ही मानदेय भुगतान हुआ है। वर्ष 2023- 24 और वर्ष 2024- 25 का भुगतान अब तक नहीं हुआ है। वर्तमान में 2025-26 सत्र चल रहा है। यानी शिक्षक दो साल से बिना मानदेय अतिरिक्त जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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