‘ऋषि सुनक के परिवार ने दो बार खोया घर’:सुधा मूर्ति बोलीं-​​​​​​​ मेरी किताब में पार्टिशन का दर्द लिखने की खास वजह यही

इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ती शनिवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल हुई। सुधा मूर्ती ने इस दौरान द मैजिक ऑफ द लॉस्ट इयरिंग्स अपनी लेटेस्ट बुक पर आयोजित किए गए सेशन में उन्होंने इसे लिखने के पीछे की इनसाइड स्टोरी शेयर की।
उन्होंने इस दौरान ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और उनके दामाद ऋषि सुनक के बारे में भी चर्चा की। उन्होंने बताया की कैसे ऋषि सुनक का परिवार पाकिस्तान को छोड़कर लंदन तक पहुंचे। इस दौरान उन्होंने पार्टीशन पर अपने मन की व्यथा भी सुनाई। अपनी ग्रैंड डॉटर के लिए लिखी किताबें
सुधा मूर्ती ने कहा यह किताब मैने मेरी ग्रैंड डॉटर अनुष्का जिसे हम घर में प्यार से नूनी कहकर बुलाते है उसके लिए लिखी। वह लंदन में रहती है। उन्होंने कहा मैं उसे बहुत सारी कहानियां सुनाना चाहती थी। लेकिन यह प्रैक्टिकली मुमकिन नहीं था। हर समय वीडियो कॉल करना संभव नहीं होता और बच्चे धीरे-धीरे बड़े भी हो जाते हैं। इसलिए मैंने नूनी के लिए किताबें लिखने का फैसला किया। जिसमें उसे उसके कल्चर से रूबरू करवा सकूं। उन्होंने कहा मैं जो फील करती हूं जो रियल में देखती हूं उसे किताबों में लिख देती हूं मैंने बच्चों के लिए पिछले 15 साल में 25 से ज्यादा किताबें लिख चुकी हूं। हमारे यहां बच्चे छुटिट्यों में नाना-नानी के घर जाते हैं सुधा मूर्ति ने कहा कि कुछ दशक पहले बच्चों के लिए ज्यादातर नोबल सीरीज जैसी विदेशी किताबें ही होती थीं, लेकिन ऐसी कहानियां भारतीय हालात से मेल नहीं खाती थीं। वहां कहानियों में दो लड़के और दो लड़कियां पिकनिक पर जाते हैं। गुफा देखते हैं, जबकि हमारे यहां ऐसी बातें बच्चों की जिंदगी से जुड़ी नहीं होतीं। सुधा मूर्ति ने कहा कि जब छुट्टियां होती हैं, तो हमारे यहां बच्चे ज्यादातर नानी या दादी के घर ही जाते हैं। इसी सोच के साथ मैं अपनी किताब में नूनी को अपने घर लेकर आई, जहां दादी खुद मैं हूं। नूनी मेरे घर आती है और हम दोनों साथ में मिलकर एडवेंचर करती हैं। यह इस सीरीज की तीसरी किताब है। बच्चों को अतीत की अहमियत बताना जरूरी उन्होंने कहा कि इस सीरीज की पहली किताब ‘द मैजिक ऑफ द लॉस्ट टेंपल’ थी, जिसमें बच्चों को बहुत आसान तरीके से आर्कियोलॉजी और पुराने समय की जानकारी दी गई है। उन्होंने कहा कि हम अक्सर बच्चों को अपने अतीत की अहमियत नहीं बताते, जबकि मेरा मानना है कि अगर आप इतिहास नहीं जानेंगे, तो भविष्य को भी नहीं समझ पाएंगे, क्योंकि इतिहास और भविष्य आपस में जुड़े होते हैं। दूसरी किताब मैने ‘द मैजिक ऑफ द लॉस्ट स्टोरी में नदी की इंपॉर्टेंस पर किताब लिखी। इस किताब को लिखते समय मुझे लगा कि मुझे इसके अंदर थोड़ी बहुत पार्टीशन के बारे में भी लिखना चाहिए। ऋषि सुनक के दादा-दादी को सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा सुधा मूर्ति ने कहा- पार्टिशन से जुड़ा हिस्सा लिखने के पीछे एक खास वजह रही। उन्होंने कहा मेरी बेटी की शादी ऋषि सुनक (ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री) से हुई । ऋषि सुनक के दादा-दादी लाहौर(पाकिस्तान), असल में गुजरांवाला के रहने वाले थे और उनकी दादी एबटाबाद से थीं। पार्टिशन के समय उन्हें पाकिस्तान से सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा। वे अपना बिजनेस, पैसा और घर, सब पीछे छोड़कर बिना कुछ लिए अफ्रीका चले गए। वहां उन्होंने फिर से नया घर बनाया और मेहनत से दोबारा अपनी जिंदगी खड़ी की।
इसके बाद वे वहां से भी लंदन चले गए, उस समय ऋषि सुनक के पिता सिर्फ 10 साल के थे। उनके परिवार ने दो बार अपना घर खोया। सुधा मूर्ति ने कहा कि दो बार घर खोना कोई आसान बात नहीं होती, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने जीरो से शुरुआत की और आगे बढ़े। आज उनका परिवार जहां है, वह सब उसी संघर्ष और मेहनत का नतीजा है, जिसे पूरी दुनिया जानती है। इसलिए मैं अनुष्का को यह बताना चाहती थी कि आज जो फ्रीडम और अपनी जगह हमें आसान लगती है, वह ऐसे ही नहीं मिली है। उसके दादा-दादी ने बहुत मेहनत की है। उन्होंने लाहौर, एबटाबाद और फिर नैरोबी में अपना घर खोया और वहां से लंदन तक की जर्नी की। मैं चाहती हूं कि अनुष्का अपनी ग्रैंड पेरेंट्स के संघर्ष और उनकी हिम्मत को समझे और जिंदगी में उसकी कद्र करना सीखे। मैं कभी कर्नाटक से बाहर नहीं गई
सुधा मूर्ति ने कहा- करीब 20 साल पहले मैं पाकिस्तान गई थी। वहां रावलपिंडी में मैंने मिसेज कोहली को देखा। वह अपने पुराने घर को देखकर रो रही थीं। मैं वहां खड़ी यह सोच रही थी कि मैं कर्नाटक से हूं। मैंने कभी कर्नाटक नहीं छोड़ा। वहीं पढ़ाई की, नदी के उस पार ही कर्नाटक के व्यक्ति से शादी की। हमारी अपनी कंपनी भी कर्नाटक में है। मैं वही भाषा बोलती हूं। मेरे सारे कज़िन्स भी कर्नाटक के आसपास ही रहते हैं। फिर मैंने अपने बच्चों को भी वही भाषा सिखाई।
इसलिए मुझे यह अनुभव नहीं है कि विदेश जाकर किसी दूसरी जमीन पर रहना क्या होता है, वहां की संस्कृति और भाषा सीखना क्या होता है। भाषा सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं होती। भाषा संस्कृति से जुड़ी होती है। संस्कृति और भाषा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
सुधा मूर्ति ने कहा – मैं नुनी से यही कहना चाहती थी कि अपने दादा-दादी की रेज़िलिएंस को याद रखना। यह समझना कि तुम किस जमीन से आती हो। हर जमीन की अपनी खासियत होती है। पंजाब की भी अपनी खासियत है। आप किसी भी पंजाबी के घर चले जाइए, वे पनीर बनाएंगे और सात कोर्स का खाना परोसेंगे। हर रीजन की अपनी भाषा होती है, अपनी संस्कृति होती है। यही सब मैं नुनी को समझाना और उससे परिचित कराना चाहती थी।
उन्होंने कहा कि हर रीजन की अपनी भाषा और अपनी संस्कृति होती है और वह यही सब नूनी तक पहुंचाना चाहती थीं। इसी सोच के साथ करीब दो साल की रिसर्च के बाद यह किताब ‘The Magic of the Lost Earrings’ लिखी गई। पार्टिशन का दर्द बहुत गहरा सुधा मूर्ति ने कहा- जब मैं पार्टिशन को देखती हूं, तो मुझे हमेशा लगता है कि बच्चों को यह जरूर बताया जाना चाहिए कि ऐसा हुआ था। जो हुआ, वह गलत था और ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए। मुझे उन लोगों के लिए बहुत दुख होता है, जिन्हें आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश से अपना घर छोड़कर आना पड़ा। एक ऐसा इंसान, जिसे भारत की संस्कृति, भाषा और यहां के लोगों के बारे में कुछ भी नहीं पता था, उसने सिर्फ पेंसिल से एक लाइन खींच दी और कहा कि आज से यह जमीन आपकी नहीं है, यह विदेशी जमीन है। सोचिए, अगर कोई मुझसे आकर कह दे कि कर्नाटक अब आपका नहीं है, तो कितना दर्द होगा। भारत में सिंध नाम की कोई जमीन नहीं
उन्होंने आगे कहा- जो लोग वहां रहते थे, वे एक ही दिन में सड़क पर आ गए, शरणार्थी बन गए। उन्हें अपनी जमीन, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति छोड़नी पड़ी। अगर कोई सिंधी यहां बैठा है, तो मुझे उनके लिए बहुत बुरा लगता है। पंजाब के लोगों के पास फिर भी पंजाब रहा, जहां पंजाबी बोली जाती है। बांग्लादेश भी बंगाली भाषा के साथ अपनी जगह पर रहा। लेकिन सिंधियों के पास कुछ भी नहीं बचा। भारत में सिंध नाम की कोई जमीन नहीं है। उन्होंने न सिर्फ अपनी जमीन खोई, बल्कि अपनी भाषा और संस्कृति भी खो दी। तीन पीढ़ियों में सिंधी भाषा लगभग खत्म हो गई। यह वही इलाका है, जहां सिंधु घाटी सभ्यता मोहनजोदड़ो और हड़प्पा फली-फूली थी। सुधा मूर्ति ने कहा-इसी वजह से मैं नूनी को मदर टंग की अहमियत, अपनी जमीन की पहचान और उस जमीन से जुड़ी संस्कृति के बारे में बताना चाहती थी। यही नूनी के तीसरे एडवेंचर की वजह बना।
अमृतसर की जर्नी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा- लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि आपको इतनी जियोग्राफी कैसे पता होती है। जैसे मैं ज्वेलरी मार्केट के उस खास कोने तक गई, वैसे ही हर जगह खुद जाकर देखा और समझा, ताकि कहानी असली लगे।

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