हाईकोर्ट से रेप व पॉक्सो एक्ट के आरोपी बरी:मेडिकल साक्ष्य से अभियोजन कहानी खारिज, पीड़िता के बयानों में विरोधाभास

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुज़फ्फरनगर पुरकाजी थाने के के रेप से एवं पॉक्सो एक्ट के आरोपी की ट्रायल कोर्ट से दोषसिद्धि को निरस्त कर दी है। कोर्ट ने अभियोजन साक्ष्यों को अविश्वसनीय पाते हुए आरोपी बंशी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। साथ ही किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर अविलंब रिहा करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि यह स्थापित कानून है कि जहां गवाहों की मौखिक गवाही अदालत का विश्वास जीतती है, तो चिकित्सा साक्ष्य को खारिज किया जा सकता है। लेकिन जहां चिकित्सा साक्ष्य अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह खारिज करता है तो मौखिक गवाही को खारिज किया जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्र प्रथम की खंडपीठ ने बंशी की अपील पर उसके अधिवक्ता और सरकारी वकील को सुनने के बाद दिया है। अपील के तथ्यों के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने बंशी को आईपीसी की धारा 363, 366, 376-डी और पॉक्सो एक्ट की धारा 5/6 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास सहित विभिन्न सजा सुनाई थीं। अपील में अभियुक्त के अधिवक्ता ने अभियोजन की खामियों को प्रस्तुत किया। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पीड़िता की चिकित्सकीय रिपोर्ट के अनुसार वह लगभग 21 सप्ताह से अधिक गर्भवती पाई गई, जो अभियोजन द्वारा बताई घटना की तिथियों से पूर्व का सिद्ध हो रहा है। ऐसे में चिकित्सकीय साक्ष्य अभियोजन कहानी का समर्थन नहीं करता। साथ ही एफआईआर, सीआरपीसी की धारा 161 व 164 और सेशन कोर्ट में पीड़िता के बयान में गंभीर विरोधाभास है। कोर्ट ने कहा कि घटनाओं की तिथि, स्थान और घटनाक्रम को लेकर एकरूपता के अभाव में पीड़िता की गवाही को पूर्णतः विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। इसके अलावा ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी, विपरीत है। ट्रायल कोर्ट ने साक्षी संख्या दो के हाईस्कूल सर्टिफिकेट को स्कूल के दस्तावेजों में दर्ज जन्मतिथि को सत्यापित किए बिना स्वीकार किया है। जबकि यह स्थापित कानून है कि स्कूल द्वारा जारी ट्रांसफर सर्टिफिकेट जन्म तिथि का साक्ष्य नहीं है। मामले में डीएनए या एफ एस एल रिपोर्ट का अभाव भी अभियोजन के लिए विपरीत जाता है। इस मामले में चिकित्सा साक्ष्य पूरी तरह अभियोजन पक्ष के मामले को खारिज करता है। इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर अभियुक्त को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

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