उत्तराखंड में भालू के डर से पूरा गांव खाली:घरों पर लटके ताले, आखिरी परिवार ने दूसरी जगह शरण लेकर कहा- वहां हम भी नहीं बचते

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में भालू के डर से पूरा गांव खाली हो गया है। लगातार हमलों से परेशान होकर एक परिवार बच गया था, अब उसने भी दूसरी जगह शरण ले ली है। गांव छोड़ने के बाद परिवार ने कहा- अगर वहां रहते तो हम भी जिंदा नहीं बचते।
मामला पोखड़ा ब्लॉक के राजस्व गांव बसटांग का है। जहां कभी 20 से अधिक परिवारों की चहल-पहल रहती थी, वहां अब ताले लटक रहे हैं और चारों ओर सन्नाटा पसरा है। दैनिक भास्कर न्यूज एप की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले कुछ समय से गांव में जंगली जानवरों, खासकर भालू के बढ़ते आतंक ने लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी थी। एक-एक कर सभी परिवार गांव छोड़कर चले गए। अंतिम परिवार के पलायन करते ही इस गांव का नाम भी अब ‘घोस्ट विलेज’ की लिस्ट में दर्ज हो गया है। गांव की दुर्दशा की PHOTOS… अब गांव के आखिरी परिवार के बारे में जानिए… बसटांग गांव में आखिरी परिवार हरिप्रसाद का था, जो पत्नी यशोदा देवी, बेटे संजय प्रसाद और बेटी शांति के साथ रहते थे। हरिप्रसाद बताते हैं कि जनवरी महीने में करीब तीन दिन के अंतराल में भालू ने उनके छह मवेशियों को मार डाला। ये मवेशी ही परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन थे, लेकिन भालू ने गोशाला तोड़ा और मवेशियों को अपना निवाला बना लिया। अफसर आए, फोटो खींची और चले गए पीड़ित परिवार ने कई बार प्रशासन और वन विभाग से मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हरिप्रसाद का आरोप है कि अधिकारी और कर्मचारी गांव पहुंचे जरूर, लेकिन सिर्फ नुकसान की तस्वीरें खींचकर लौट गए। न तो भालू से बचाव के लिए कोई स्थायी इंतजाम किए गए और न ही मारे गए मवेशियों का मुआवजा दिया गया। जान का खतरा देख छोड़ा पैतृक गांव लगातार हो रहे हमलों से डरे हरिप्रसाद ने परिवार की सुरक्षा को प्राथमिकता दी और अपने पैतृक गांव बसटांग को छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा, हमारे पास एक जोड़ी बैल और गायें थीं, जिनसे घर चलता था। भालू ने सब को मार दिया। अब न तो रोजी बची है और न ही गांव में रहना सुरक्षित है। परिवार का कहना है कि अब तक वन विभाग और प्रशासन की ओर से किसी भी तरह की मदद नहीं मिली। पनिया गांव बना नया ठिकाना अपने पैतृक घर को ताला लगाकर हरिप्रसाद का परिवार अब पनिया ग्राम सभा में शरणार्थी की तरह रह रहा है। पनिया के ग्रामीणों और ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी ने उन्हें सहारा दिया है। ग्रामीण खुद उनका घरेलू सामान लेकर आए और उनकी गुजर-बसर में मदद कर रहे हैं। पनिया गांव में भी भालू का आतंक
पनिया गांव में फिलहाल करीब 35 परिवार रहते हैं। ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी ने बताया कि भालू का आतंक बसटांग तक सीमित नहीं है। पनिया और आसपास के इलाकों में भी हालात चिंताजनक हैं। उन्होंने बताया कि महिलाओं में डर का माहौल है। घास और लकड़ी लेने के लिए जंगल जाना अब जोखिम भरा हो गया है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। मुख्यमंत्री धामी को लिखा पत्र हर्षपाल नेगी के मुताबिक, वन विभाग की टीम गांव आई थी, लेकिन उन्होंने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि भालू को मारना प्रतिबंधित है। टीम कैमरे लगाकर लौट गई। इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भी पत्र भेजा गया है, लेकिन अभी तक सुनवाई नहीं हुई है। सिस्टम की उदासीनता से हुआ पलायन पोखड़ा के जिला पंचायत सदस्य बलवंत सिंह नेगी ने कहा कि वन विभाग और प्रशासन की उदासीनता के कारण बसटांग गांव से पलायन हुआ है। आगे कहा- बसटांग में भालू द्वारा लगातार मवेशियों को मारा गया। एक गरीब परिवार अकेला गांव में रह रहा था, जिसकी आजीविका खत्म हो गई। बार-बार अवगत कराने के बावजूद वन विभाग और प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि मैं कई बार जिला पंचायत बैठकों और शासन-प्रशासन के सामने इस समस्या को उठा चुका हूं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *