जिंसी स्थित स्लॉटर हाउस के दस्तावेज चौंकाने वाला खुलासा कर रहे हैं। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि कैमरे हों या डॉक्टर… स्लॉटर हाउस में पूरी तरह नियंत्रण संचालक असलम के हाथ में था। निगम ने आंखें मूंद रखी थीं।
जो 26 टन बीफ पकड़ा गया था, परिवहन दस्तावेजों के हिसाब से ये 85 भैंसों का बताया गया है। लेकिन ये दावा तथ्यों से मेल नहीं खाता। इंडियन काउंसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च के वैज्ञानिकों के शोध-पत्र के मुताबिक भारत के बूचड़खानों में आमतौर पर 225-300 किलो वजन की भैंस ही काटने के लिए लाई जाती हैं। इसमें भी काटने के बाद उपयोग लायक मीट की मात्रा वजन के आधे से भी कम रह जाती है। भोपाल के मामले में एक भैंस का वजन 300 किलो भी माना जाए तो 85 भैंसों से प्राप्त बोनलेस बीफ की मात्रा 9 टन भी नहीं होती। ऐसे में पूरी आशंका है कि 26 टन के कंटेनर में करीब 17 टन हिस्सा गोमांस का ही था। बूचड़खाने के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर दावा किया जा रहा है कि वहां सिर्फ भैंसें काटी गई। तो फिर यह अतिरिक्त मांस कहां से काटकर कंटेनर में लोड किया गया। अनुमानत: इसके लिए 150 से 200 के बीच गोवंश काटा गया होगा। आशंका ये है कि अतिरिक्त 17 टन मांस अवैध कत्लखानों से या उस जगह से लाया गया हो, जहां मृत जानवरों का निपटान किया जाता है। 85 भैंसें काटने का दावा; इनसे 9 टन मांस ही मिल सकता है, बाकी कहां से आया नगर निगम की तरह रंगवाए निजी वाहन असलम द्वारा मृत जानवरों को उठाने के लिए जो निजी वाहन उपयोग किए जाते थे, उन पर नगर निगम लिखवा रखा है। ऊपर पेंट भी नगर निगम के वाहनों की तरह है। जानवर के वजन का सिर्फ आधा ही हिस्सा उपयोगी इंडियन जनरल ऑफ एनिमल रिसर्च में प्रकाशित शोध-पत्र के मुताबिक, भारत के बूचड़खानों में भैंसों का औसत वजन 278 किलो के आसपास पाया गया। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि काटने के बाद उपयोग किया जा सकने लायक बीफ की औसत मात्रा (हड्डी सहित) जानवर के कुल वजन का लगभग 47.3% ही होती है। बाकी हिस्सा खाल हड्डी एवं अन्य अंगों का होता है। जैसे एक भैंस का वजन 300 किलो है तो उससे 144-150 किलो कटा हुआ मांस (carcass) मिल सकता है। इसमें भी ‘बोनलेस बीफ’ 90 से 105 किलो तक ही होता है। कंटेनर में यही बोनलेस बीफ पाया गया था। गड़बड़ी ये भी… निजी डॉक्टर से बनवाया सर्टिफिकेट बूचड़खाने में पदस्थ पशु चिकित्सक बीपी गौर को निलंबित किया गया है। लेकिन, कंटेनर से जब्त दस्तावेजों से साफ है कि परिवहन संबंधी जरूरी प्रमाण पत्र पर निगम के डॉक्टर के हस्ताक्षर ही नहीं हैं। परिवहन के लिए एक पशु चिकित्सक द्वारा जारी प्रमाण-पत्र जरूरी होता है। दस्तावेजों के मुताबिक यह प्रमाण पत्र निजी पशु चिकित्सक अनम खान द्वारा जारी किया गया था। दिखाने के लिए प्रमाण पत्र में एक कोने में सरकारी डॉक्टर का पद नाम आदि लिखा होता था। लेकिन साइन-सील निजी डॉक्टर की होती थी। एमआईसी की सहमति से मंजूरी, सीसीटीवी कंट्रोल असलम के पास स्लॉटर हाउस को चलाने की अनुमति 24 अक्टूबर 2025 को एमआईसी के संकल्प क्र. 2 के तहत लाइवस्टॉक फूड प्रोसेसर प्राइवेट लिमिटेड को दी गई थी। इसमें मेयर के साथ सभी 10 एमआईसी सदस्यों की मंजूरी थी। इसमें लिखा गया था कि स्लॉटर हाउस को तय नियमों के अनुसार संचालन व रखरखाव के लिए औपचारिक रूप से एजेंसी को सौंपा जा रहा है। मांस के सैंपल रखे जाना शर्तों में शामिल नहीं था। परिसर में 24 घंटे सीसीटीवी कैमरे चालू रहना शर्तों में था लेकिन इसका कंट्रोल एजेंसी के पास ही था। शर्तों के अनुसार, डीबीएफओटी मॉडल पर कंपनी ही डिजाइन करेगी, बनाएगी, पैसा लगाएगी, चलाएगी और 20 साल बाद निगम को सौंप देगी। एनजीटी, एफएसएसएआई, एपीईडीई जैसी नियामक संस्थाओं के नियम मानने होंगे। दैनिक भास्कर के पास स्लॉटर हाउस की अनुमतियों और शर्तों से जुड़े सारे दस्तावेज मौजूद हैं। इनकी मौजूदगी में दी गई अनुमति
महापौर मालती राय, रवींद्र यति, सुषमा बावीसा, अशोक वाणी, आनंद अग्रवाल, जितेंद्र शुक्ला, आरके बघेल, मनोज राठौर, छाया ठाकुर, राजेश हिंगोरानी और जगदीश यादव। मांस के सैंपल रखना शर्त में नहीं था
मांस के सैंपल रखना शर्त में नहीं था। सीसीटीवी कंट्रोल कंपनी के पास ही था। शर्त ये थी कि जब भी फुटेज मांगे जाएंगे, तो उपलब्ध कराने होंगे। इसे एमआईसी में लाकर संचालन की अनुमति शर्तों के साथ दी गई थी। – आरके बघेल, एमआईसी सदस्य


