राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले मरीजों को गंभीर अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है। सेंट्रल इमरजेंसी में बेड फुल हैं। एक साथ 7 से 8 मरीज स्ट्रेचर पर पड़े रहने को मजबूर हैं। ऐसे में मरीजों को न समय पर बेड मिल पा रहा है, न इलाज ही शुरू हो पा रहा है और न ही डॉक्टर मरीजों को प्राथमिकता दे पा रहे हैं। कई बार डॉक्टर भी तब तक मरीज को अटेंड नहीं करते, जब तक उन्हें बेड उपलब्ध न हो जाए। इसका सीधा असर इलाज की शुरुआत पर पड़ता है। कई मामलों में मरीजों की हालत बिगड़ती चली जाती है, लेकिन व्यवस्था की सुस्ती के आगे कोई सुनवाई नहीं होती। यह स्थिति न केवल अमानवीय है, बल्कि सीधे तौर पर मरीजों की जान के लिए खतरा बन चुकी है। रिम्स पहुंचने के बाद सबसे पहले गंभीर मरीजों को सेंट्रल इमरजेंसी लाया जाता है, लेकिन यहां पहुंचते ही एक नई लड़ाई शुरू हो जाती है। मंगलवार को सामने आई तस्वीर बेहद चिंताजनक रही। इमरजेंसी के भीतर एक साथ 8 मरीज स्ट्रेचर पर पड़े थे। मरीजों के परिजनों का कहना है कि ये सभी 4 से 5 घंटे से अधिक समय से इंतजार कर रहे हैं। यहीं नहीं, इमरजेंसी के बाहर तीन एंबुलेंस खड़ी थीं, जिनमें भी मरीज स्ट्रेचर मिलने का इंतजार कर रहे थे। मामले पर रिम्स प्रबंधन ने कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। हालांकि एक अन्य डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगले 2-3 दिनों में स्थिति ठीक हो जाएगी। 24 घंटे में शिफ्ट करने का है नियम नियम कहता है कि किसी भी मरीज को इमरजेंसी में भर्ती करने के बाद 24 घंटे के भीतर संबंधित विभाग के वार्ड में शिफ्ट किया जाना चाहिए। यदि मरीज वेंटिलेटर सपोर्ट पर है, तो उसे भी संबंधित विभाग के आईसीयू में स्थानांतरित किया जाना जरूरी है। लेकिन रिम्स में हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। कई मरीज 48 से 72 घंटे से अधिक समय तक इमरजेंसी में ही पड़े रहते हैं। बेड खाली न होने के कारण गंभीर मरीजों को वेंटिलेटर तक समय पर नहीं मिल पाता। मजबूरी में कई परिजन मरीज को निजी अस्पताल ले जाने का फैसला करते हैं, जो हर किसी के लिए संभव नहीं है। महीनों पहले का वादा आज तक पूरा नहीं रिम्स प्रबंधन की उदासीनता का एक और उदाहरण ऑन्कोलॉजी बिल्डिंग में सेंट्रल इमरजेंसी के एक्सटेंशन का मामला है। करीब तीन महीने पहले रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार ने बताया था कि एक माह के भीतर ऑन्कोलॉजी बिल्डिंग में इमरजेंसी शुरू कर मरीजों को शिफ्ट किया जाएगा। यहां करीब 50 से 60 बेड का इमरजेंसी एक्सटेंशन शुरू होना था। स्वास्थ्य मंत्री के निरीक्षण के दौरान भी यही दावा दोहराया गया था। लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी एक भी इमरजेंसी मरीज को वहां शिफ्ट नहीं किया गया। नतीजा- वही पुराना बोझ, वही अव्यवस्था और वहीं पीड़ा। मेडिसिन विभाग बना सबसे बड़ी बाधा : ग्राउंड फ्लोर स्थित सेंट्रल इमरजेंसी में लगभग 40 बेड हैं। मंगलवार को यहां करीब 42 मरीज भर्ती थे। इनमें से 17 मरीज ऐसे थे, जो 48 से 72 घंटे से अधिक समय से इमरजेंसी में थे। इनमें से लगभग 80% मरीज मेडिसिन विभाग के थे। बाकी मरीज सर्जरी और न्यूरोसर्जरी विभाग से संबंधित थे। यह साफ संकेत देता है कि विभागीय स्तर पर बेड मैनेजमेंट पूरी तरह फेल है। रिम्स के इमरजेंसी में इलाज के इंतजार में स्ट्रेचर पर पड़े मरीज। डॉक्टर के आने की राह देखते परिजन।


