इंदौर में दूषित पानी से मौतों के बाद सीएम डॉ. मोहन यादव ने हर सप्ताह जल सुनवाई के निर्देश दिए हैं। इसमें 11 तरह की जांचें करने को कहा गया है। लेकिन भोपाल में प्रशासन इसको लेकर जरा भी गंभीर नहीं है। भास्कर रिपोर्टर्स ने मंगलवार को वार्ड 68, 70, 75 और 77 में जाकर जलसुनवाई की प्रक्रिया देखी। जल गुणवत्ता फील्ड टेस्ट किट में 11 तरह की जांचों की सुविधा है, पर हर जगह कर्मचारी सिर्फ क्लोरीन की जांच करते दिखे। उनका कहना था कि उन्हें इसी जांच की ट्रेनिंग दी गई है। हैरत की बात है कि इसमें भी केमिकल डालने के बाद रंग पहचानने और उसे सही मानक से मिलाने में कर्मचारी असमंजस में दिखे। कुछ स्थानों पर पीएच और हार्डनेस जैसी जांच भी की गई, पर वह अपवाद जैसी रही। ये दो तो बस उदाहरण हैं… स्थान- वार्ड 75, {समय- सुबह 11:30 बजे।
नगर निगम के वार्ड कार्यालय में रिपोर्टर ने पानी की बोतल देकर जांच करने को कहा। कर्मचारी मोहन बोतल से पानी जार में डालते हैं, मोबाइल फोन की टॉर्च नीचे रखकर देखते हैं। कहते हैं- छोटे-छोटे कण दिख रहे हैं, पानी ठीक नहीं है। बिना केमिकल डाले ही नतीजा सुना दिया। जब केमिकल डालने की बात कही तो बोले- मेरी किट दूसरा अफसर ले गया। स्थान- वार्ड 77, {समय- दोपहर 12:10 बजे।
कर्मचारी इरशाद सिद्दीकी पानी की बोतल लेते हैं। क्लोरीन जांच के लिए केमिकल डालते हैं। फिर एक किताब खोलकर उसमें दिए रंग से किट के रंग को मिलाने की कोशिश करते हैं। कुछ देर देखने के बाद बोले- सर, यही वाला लग रहा है। हल्का पीला रंग दिखा तो बोले- पानी में क्लोरीन है। भास्कर एक्सपर्ट – अस्थाई कर्मचारियों से पानी की जांच करा रहे, यह सेहत से खिलवाड़ पीने के पानी की जांच प्रशिक्षित व्यक्ति ही कर सकता है, जिसे पानी की गुणवत्ता और केमिकल की मात्रा की सही जानकारी हो। 29 दिवसीय कर्मचारियों (ऐसे कर्मचारी जिन्हें अस्थाई तौर पर 29 दिन के लिए रखते हैं) को यह जिम्मेदारी देना ठीक नहीं। विषय सीधे जनता की सेहत से जुड़ा है। पानी की जांच के लिए केमिस्ट या कम से कम लैब असिस्टेंट की तैनाती जरूरी है। जांच उसकी निगरानी में नहीं, बल्कि उसके द्वारा होनी चाहिए।’
-आर.बी. राय, रिटायर्ड ईई, पीएचई


