7 दशक बाद फिर खोदी गई अश्वमेध यज्ञशाला की जमीन:देहरादून में पुरातत्व विभाग कर रहा चौथी वेदिका की तलाश, तीसरी शताब्दी से जुड़ा इतिहास

देहरादून से लगभग 50 किलोमीटर दूर बाड़वाला स्थित जगतग्राम इन दिनों एक बार फिर इतिहास के पन्नों में लौट रहा है। करीब 7 दशक बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहां अश्वमेध यज्ञ से जुड़ी चौथी यज्ञशाला (वेदिका) की खोज के लिए उत्खनन शुरू किया है। इससे पहले 1952 से 1954 के बीच हुए उत्खनन में तीन यज्ञ शालाएं मिल चुकी थीं, लेकिन चौथी की तलाश अब जाकर दोबारा शुरू हो सकी है। एक दिसंबर से शुरू हुए उत्खनन कार्यों को करीब से समझने के लिए दैनिक भास्कर न्यूज एप की टीम वहां पहुंची और खुदाई के दौरान मिली चीजों को बारीकी से समझा। आर्कियोलॉजिस्ट विपुल मिश्रा के मुताबिक, मौजूदा उत्खनन का मकसद तीसरी शताब्दी ईस्वी में हुए अश्वमेध यज्ञ के दौरान निर्मित चौथी यज्ञशाला को ढूंढना है। चार यज्ञशालाओं में से तीन 1952-54 की खुदाई में मिल चुकी थीं। अब चौथी के लिए फिर से खुदाई की जा रही है। 10 से 14 फीट नीचे तक खुदाई, मिले ब्रिक्स और पॉट शेल्स एक दिसंबर से शुरू हुए उत्खनन में अब तक करीब 10 से 14 फीट गहराई तक खुदाई हो चुकी है। इस दौरान टीम को प्राचीन ईंटें (ब्रिक्स), मृदभांड (पॉट शेल्स) और घड़े मिले हैं। विपुल मिश्रा के मुताबिक, मिली ईंटों का साइज और बनावट ठीक वैसी ही है जैसी 1952-54 की खुदाई में मिली थीं। इससे संकेत मिलता है कि ये उसी काल से जुड़ी हैं। कैसे होती है प्राचीन वस्तुओं की पहचान? खुदाई में अगर हड्डियां या विशेष एंटीक्विटी मिलती हैं, तो उन्हें पहचान के लिए लैब में कार्बन डेटिंग कराई जाती है। फिलहाल चौथी यज्ञशाला की खुदाई में कोई ऐसी वस्तु नहीं मिली है जिसे तुरंत लैब भेजा जाए, लेकिन अब तक मिली सारी सामग्री तीसरी शताब्दी ईस्वी से जुड़ी मानी जा रही है। चौथी जगह कैसे तय हुई? 1952-54 के उत्खनन के दौरान कुछ ऐसी ईंटें मिली थीं, जिन पर ब्राह्मी लिपि में स्पष्ट लिखा था कि तीसरी शताब्दी में यहां राजा शील वर्मन ने अश्वमेध यज्ञ कराया था। इसी शिलालेख के आधार पर अब लगभग 70 साल बाद दोबारा उत्खनन शुरू किया गया है। हालांकि, अभी यह तय नहीं हो पाया है कि जहां खुदाई चल रही है वहां वेदिका मौजूद है या नहीं। कौन थे राजा शील वर्मन? राजा शील वर्मन, कुणिंद (कुलिंद) वंश के शासक थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, उनका साम्राज्य हरिपुर, सरसावा, विकासनगर और संभवतः लाखामंडल तक फैला था। इस क्षेत्र को तब युग शैल साम्राज्य कहा जाता था। राजधानी हरिपुर हुआ करती थी। वृषगण गोत्र के वर्मन वंश द्वारा इस क्षेत्र पर शासन किया गया। जौनसार बावर में जयदास और उनके वंशजों का शासन 350 से 460 ईस्वी तक माना जाता है, जबकि 301-400 ईस्वी के बीच युग शैल राजाओं का प्रभाव भी रहा। क्या होता है अश्वमेध यज्ञ? प्राचीन भारत में अश्वमेध यज्ञ शक्तिशाली राजाओं द्वारा साम्राज्य विस्तार के लिए किया जाता था। अनुष्ठान के बाद एक सुसज्जित घोड़ा छोड़ा जाता था। घोड़ा जहां-जहां जाता, वह क्षेत्र खुद राजा के अधीन माना जाता था। अगर कोई दूसरा राजा घोड़ा पकड़ लेता, तो युद्ध अनिवार्य हो जाता था। यानी जो भी घोड़ा पकड़ता उसे उस राजा के साथ युद्ध करना पड़ता था जिसने घोड़ा छोड़ा था। 1952-54 की खुदाई ने खोले थे इतिहास के द्वार जगतग्राम में पहली खुदाई ASI के पुरातत्वविद् टी.एन. रामचंद्रन द्वारा 1952-54 में की गई थी। तब ईंटों से बनी संरचनाएं मिलीं, जिन्हें उड़ते हुए गरुड़ के आकार की वेदिका बताया गया। ईंटों पर तीसरी शताब्दी ईस्वी के ब्राह्मी लिपि और संस्कृत अभिलेख मिले, जिनमें चार अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख था। ऐसी अग्निवेदिकाओं के प्रमाण पुरोला (उत्तरकाशी), कौशांबी और इलाहाबाद में भी मिले हैं। 4 ट्रेंच, कई संकेत… लेकिन इंतजार अब भी उत्खनन टीम ने वाडिया इंस्टीट्यूट से संपर्क किया है। वैज्ञानिक यहां की मिट्टी के सैंपल लेकर जांच करेंगे, जिससे मिट्टी के जमाव की उम्र और पॉट्री की तिथि का पता लगाया जा सकेगा। यह ट्रायल जनवरी माह तक चलेगा। फिलहाल इलाके में 4 ट्रेंच खोदे गए हैं, जिनसे कई ऐसे संकेत मिले हैं जो तीसरी शताब्दी से जुड़े हैं। हालांकि, चौथी यज्ञशाला की पुष्टि अभी बाकी है। गौरतलब है कि मंगलवार को देहरादून स्थित कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज के निजी आवास पर पुरातत्व विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक में उत्तराखंड की वैदिक विरासत, विशेषकर कालसी (हरिपुर) और पुरोला में मिले अश्वमेध यज्ञ स्थलों के संरक्षण पर मंथन हुआ। इन यज्ञ वेदिकाओं के संरक्षण के साथ-साथ यहां प्राचीन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अनुष्ठान शुरू करने का संकल्प लिया गया, ताकि देवभूमि के इस गौरवशाली इतिहास को विश्व पटल पर प्रस्तुत किया जा सके। जगत ग्राम में चल रहा यह उत्खनन केवल मिट्टी नहीं, बल्कि तीसरी शताब्दी की जुड़ी सभ्यता के इतिहास को सामने लाने की कोशिश है। अगर चौथी यज्ञशाला मिल जाती है, तो यह न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के पुरातात्विक इतिहास के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। इतिहास की इस खुदाई पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं।

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