धर्मेंद्र समदानी | चित्तौड़गढ़ सर्दियों में बनने वाला देसी गुड़ भी चित्तौड़गढ़ की पहचान बना रहा है।मिठास, शुद्वता व लंबे समय तक टिकाऊ के साथ केमिकल की जगह भिंडी के पानी का उपयोग इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इससे यह मिठास प्रदेश के कई हिस्सों के अलावा बाहर व दिल्ली-मुंबई तक भी पहुंच रही है। यह भी वजह है कि ये चरखियां अब ज्यादातर राष्ट्रीय राजमार्गों पर है। जहां औसत प्रतिदिन 200 क्विंटल से अधिक गुड़ बन रहा है। जो मोटे तौर पर करीब 12 लाख रुपए का कारोबार है। ये चरखियां करीब 100 लोगों को सीधे रोजगार भी दे रही। जिले में देसी गुड़ निर्माण के पीछे बड़ी वजह शुरू से गन्ने की खेती है। गुड इसी से बनता है। आसानी से उपलब्ध होने से चरखी दिनभर चलती रहती है। अब बड़े स्तर पर ये मुख्य रूप से निम्बाहेड़ा के पास सतखंडा, चित्तौड़ के पास देवरी, आजोलिया का खेड़ा, पाठोलिया, खेड़ी,आसोड़ा और गंगरार नया खेड़ा आदि जगह है। राष्ट्रीय राजमार्गों या इसके एकदम पास होने से लोग आसानी से वाहन रोककर देसी गुड़ खरीद लेते हैं। गुड़ की महक व पहचान भी आकृष्ट कर लेती है। सतखंडा में तीन पीढ़ियों से यही काम कर रहे आरिफ खान के अनुसार पानी से दूर रखो तो यह गुड़ लंबे समय तक चलता है। खराब नहीं होता। फैक्ट्री और चरखी पर गुड़ बनाने की प्रक्रिया में ज्यादा अंतर नहीं होता है पर फैक्ट्री वाले गन्ने के जूस को क्लीन करने के लिए केमिकल का इस्तेमाल करते हैं। हम इसके स्थान पर भिंडी के पानी का उपयोग करते है। इस कारण मेहनत भी अधिक लगती है। प्रतिदिन के गुड उत्पादन में करीब 10 किलो भिंडी का उपयोग होता है। भिंडिया उत्तर प्रदेश से भी मंगवाते हैं। उसके दादा ने यह काम शुरू किया था। उसके बाद पिता व खुद भी इसे जारी रखे हुए हैं। जिले में 13-14 चरखियां, प्रत्येक पर औसत रोज 66 टन गुड़ तैयार होता है जिले में इस तरह की 13से 14 चरखियां चल रही है। मोटे तौर पर एक क्विंटल गुड़ बनाने में एक से डेढ़ घंटा लगता है। इस तरह प्रत्येक चरखी पर रोज लगभग 15 क्विंटल के हिसाब से कुल 210 क्विंटल देशी गुड़ का उत्पादन होता है। प्रत्येक चरखी पर पूरे सीजन में लगभग 3 हजार डिब्बे गुड बनाते हैं। प्रत्येक डिब्बे में 22 किलो गुड़ आता है। यानी हर चरखी पर प्रतिदिन 66 टन और सभी मिलाकर 924 टन गुड़ बनता है।


