सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि, यह प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी होनी चाहिए। चुनाव आयोग मनमानी नहीं कर सकता। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या SIR नियमों से हटकर हो सकती है। इस पर चुनाव आयोग की तरफ से दलील दे रहे एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा- वोटर लिस्ट की जांच करना न्यायसंगत और सही है। कोर्ट को इस प्रक्रिया के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर देना चाहिए। द्विवेदी ने आगे कहा कि कुछ NGO और नेताओं के कहने पर हर मामले की जांच नहीं हो सकती। बिहार में जिन 66 लाख लोगों के नाम हटे हैं उनमें से किसी ने कोर्ट में शिकायत नहीं की। आजकल ECI को गाली देकर चुनाव जीतना फैशन बन गया है। कोर्ट में चुनाव आयोग के 5 तर्क कानून (Representation of People Act, 1950) के तहत ECI को वोटर लिस्ट की विशेष जांच करने का अधिकार है। SIR कैसे किया जाए, यह आयोग तय कर सकता है। बिहार में करीब 20 साल से ऐसी जांच नहीं हुई थी। जनसंख्या बदलाव, शहरों में पलायन बढ़ा है। इसलिए वोटर लिस्ट अपडेट जरूरी थी। 2003 में नागरिकता कानून में बदलाव हुआ था। अब नागरिकता साबित करने के नियम सख्त हुए हैं। घर-घर जाकर जांच हुई। 5 करोड़ SMS भेजे गए। 76% वोटरों से कोई दस्तावेज नहीं मांगा गया। बाकी लोगों से 11 प्रकार के दस्तावेज लिए गए। ECI का मकसद संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत यह देखना था कि कोई व्यक्ति नागरिक है या अवैध प्रवासी। कहीं माता-पिता अवैध प्रवासी तो नहीं।


