भास्कर संवाददाता| हनुमानगढ़ जिले में वाहनों की फिटनेस जांच पिछले करीब 8 महीनों से मैन्युअल तरीके से की जा रही है। अहम बात यह है कि सरकार के निर्देशों के अनुसार वाहन फिटनेस केवल एटीएस (ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन) के जरिए होनी थी। मुख्यालय पर बने दो केंद्रों को समय रहते एटीएस में अपग्रेड नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि आधुनिक मशीनों के बजाए मैन्युअल व्यवस्था के भरोसे हर माह करीब 400 वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट दिया जा रहा है। दरअसल, मार्च 2025 तक इन केंद्रों पर नियमित जांच होती रही। इसके बाद सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के निर्देशों के तहत 1 अप्रैल से केवल ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) से ही वाहन फिटनेस अनिवार्य कर दी गई। आदेश लागू होते ही जिले के दोनों फिटनेस केंद्र बंद हो गए। वाहन मालिकों की परेशानी देखते हुए मई में मैन्युअल तरीका अपनाया गया। संभाग की बात करें तो बीकानेर और नोखा में एटीएस चल रहे हैं। विदित रहे कि मैन्युअल फिटनेस जांच में तकनीकी उपकरण शामिल ही नहीं होते हैं। ऐसे में इनकी कमी के कारण ब्रेक, सस्पेंशन और प्रदूषण की सटीक जांच नहीं हो पाती। इसमें मानवीय त्रुटि और लापरवाही की संभावना अधिक रहती है। इसके साथ साथ पारदर्शिता कम होने से भ्रष्टाचार की आशंका भी बढ़ जाती है। समय अधिक लगने से वाहन मालिकों को परेशानी होती है। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि तकनीकी रूप से कमजोर वाहन भी फिट घोषित हो जाते हैं, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। ^जिले में दो ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन स्थापित किए जाने प्रस्तावित हैं। इसके लिए परिवहन विभाग की ओर से प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और संबंधित पोर्टल पर आवेदन भी लिए जा रहे हैं। प्रस्ताव की फाइल पहले ही परिवहन मुख्यालय भेजी जा चुकी है। स्वीकृति और प्रक्रिया पूरी होते ही जिले में दोनों एटीएस जल्द शुरू किए जाएंगे, जिससे वाहन फिटनेस जांच आधुनिक और पारदर्शी तरीके से हो सकेगी। -नरेश पूनिया, डीटीओ, हनुमानगढ़। पड़ताल: मशीनों के बजाए आंखों से ही देखकर टेस्ट कर रहे: मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार परिवहन वाहनों के लिए फिटनेस प्रमाणपत्र अनिवार्य है। पुराने वाहनों के लिए फिटनेस रिन्युअल हर 1 या 2 साल में होता है। जांच स्वचालित परीक्षण स्टेशनों में की जाती है और जांच के आधार पर ही सर्टिफिकेट मिलता है। यही वजह है कि बस, ट्रक, ट्रैक्टर-ट्रॉली, टैक्सी और अन्य मालवाहक वाहन इसमें शामिल होते हैं। अगर ऑटोमेटेड स्टेशन होते तो मशीनों से ब्रेक, हेडलाइट, सस्पेंशन, प्रदूषण स्तर और वाहन के नीचे की स्थिति की जांच होती, लेकिन अब यह सब केवल आंखों से देख परखकर और कागजी औपचारिकताओं तक सीमित रह गया है।


