महाभारत समागम में भारतीय और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच का संगम:मंत्री बोले- नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा

भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक विरासत को समकालीन रंगमंच से जोड़ने वाले महाभारत समागम के आठवें दिन भारत भवन के सभी मंच जीवंत हो उठे। वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित इस महोत्सव में यक्षगान, ओडिसी नृत्य-नाटिका द्रौपदी, जापानी रंगमंचीय प्रस्तुति महाभारत और कर्ण के जीवन पर आधारित नाटक मृत्युंजय का मंचन हुआ। दर्शकों ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय रंग-परंपराओं का एक साथ सशक्त अनुभव किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार रहे। उन्होंने कहा कि वीर भारत न्यास भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन जीने की वैज्ञानिक, नैतिक और पर्यावरणीय दृष्टि भी प्रदान करती है। प्रकृति, जल, सूर्य और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता भारत की परंपरा का मूल है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा और पढ़ाई के बोझ को कम किया जाएगा। 2047 के भारत के ऊर्जा संकल्प और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा साझेदारी का भी उन्होंने उल्लेख किया। कर्ण के संघर्ष, त्याग और उदारता की प्रस्तुति मंच पर एकरंग, मुंबई द्वारा प्रस्तुत नाटक मृत्युंजय ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से बांधे रखा। शिवाजी सावंत के चर्चित उपन्यास पर आधारित यह नाटक कर्ण के जीवन के संघर्ष, अपमान, मित्रता, कर्तव्य और उदारता को गहराई से सामने लाता है। माता कुन्ती द्वारा त्याग, सामाजिक अस्वीकृति, द्रोणाचार्य से निराशा और दुर्योधन से मित्रता, इन सबके बीच कर्ण का आत्मसंघर्ष उसे केवल योद्धा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का प्रतीक बनाता है। कुरुक्षेत्र में उसका बलिदान दर्शकों को भीतर तक झकझोर देता है। एशियाई कलाकारों की अनूठी प्रस्तुति अंतरंग सभागार में जापान की हिरोशी कोइके ब्रिज कंपनी द्वारा प्रस्तुत महाभारत ने महाकाव्य को समकालीन और अंतर-सांस्कृतिक नजरिए से देखा। नौ वर्षों की पैन-एशियन परियोजना के तहत जापान, ओकिनावा, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड के कलाकारों ने मिलकर यह प्रस्तुति तैयार की है। विभिन्न भाषाओं और रंगशैलियों में रची यह नाट्य-रचना शक्ति, कर्तव्य, त्याग और मानवीय सीमाओं पर नए सवाल खड़े करती है। भीष्म के जीवन पर केंद्रित प्रस्तुति शपथ और पाप में त्याग और निष्ठा की त्रासदी प्रभावशाली ढंग से उभरती है। द्रौपदी: स्त्री अस्मिता की मुखर आवाज पूर्वरंग मंच पर ओडिसी नाट्य बैले सेंटर, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत नृत्य-नाटिका द्रौपदी: एक अदम्य भावना ने स्त्री अस्मिता को केंद्र में रखा। निवेदिता महापात्रा के निर्देशन में द्रौपदी को पीड़िता नहीं, बल्कि प्रश्न करने वाली और प्रतिरोध की प्रतीक स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया गया। स्वयंवर से लेकर जुए की सभा और वनवास तक, द्रौपदी का संघर्ष आज की सामाजिक संरचना में महिलाओं की स्थिति पर गहरी टिप्पणी करता है। ओडिसी और मयूरभंज छऊ का संयोजन प्रस्तुति को कलात्मक ऊंचाई देता है। यक्षगान में अभिमन्यु का बलिदान कर्नाटक की लोकनाट्य शैली यक्षगान की प्रस्तुति ने दर्शकों को लोक परंपरा की ऊर्जा से भर दिया। पृथ्वीराज क्वायथर के निर्देशन में महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन की कथा दिखाई गई, जहां चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु का अद्वितीय साहस और बलिदान भावुक कर गया। संगीत, नृत्य और संवाद की लयात्मकता ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया।

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