पैसा नहीं चुकाने पर अस्पताल में मां-नवजात बंधक बने:15 हजार के लिए रोके रहे; मीडिया पहुंची तो बोले-मालूम नहीं था, अभी रिलीफ करते है

गरियाबंद जिले के एक निजी हॉस्पिटल में गर्भवती महिला की डिलवरी के बाद उसे और नवजात को बंधक बनाकर रख लिया गया था। पीड़ित परिवार भुजिया जनजाति से है। धर्मगढ़ स्थित मां भंडारणी क्लिनिक में डिलवरी के बाद 15 हजार नहीं चुकाने पर उन्हें 6 दिन तक बंधक बनाकर रखा गया। मैनपुर की रहने वाली नवीना चींदा (23 साल) को प्रसव का दर्द उठने पर परिवार उन्हें अस्पतला लेकर पहुंचा। वहां नॉर्मल डिलवरी होने पर 20 हजार का बिल बना। परिवार सिर्फ 5 हजार ही चुका पाया, 15 हजार कहीं से भी लाकर देने की बात कही। पीड़िता की सास पैसों के इंतजाम के लिए गांव वापस लौटी। मामला मीडिया के संज्ञान में आते ही सॉल्व हो गया। जवाब लेने जब पत्रकार संचालक के पास पहुंचे तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा है कि परिवार ने पैसों की दिक्कत बताई होती तो उन्हें पहले ही जाने देते। वहीं, संचालक चैतन्य मेहेर ने कैमरा भी बंद करवा दिया जिसके बाद मां नवजात को एंबुलेंस से वापस गांव भेजा गया। अब जानिए पूरा मामला जिले के आदिवासी ब्लॉक मैनपुर के मूचबहल के मालिपारा वार्ड की रहने वाली नवीना चींदा को 18 जनवरी को लेबर पेन उठा। जिसके बाद कालाहांडी के धर्मगढ़ स्थित मां भंडारणी क्लिनिक में भर्ती कराया गया था। उसी दिन नॉर्मल डिलवरी के बाद उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया। अस्पताल में भर्ती के समय 5,000 रुपए जमा किए गए थे, लेकिन प्रसव के बाद और 15 हजार रुपए की मांग की गई। पति झारखंड में मजदूरी करता है प्रसूता की सास दोषो बाई ने बताया कि पैसे का इंतजाम करने के लिए वह 21 जनवरी को अपने गांव लौट आईं। उन्होंने बताया कि उनका बेटा पोड़ा आंध्र प्रदेश में ईंट भट्ठे पर मजदूरी करता है और वह भी पैसे का इंतजाम नहीं कर पा रहा था। ऑपरेशन से डिलवरी होने पर 85 हजार का बिला बना था दोषो बाई के मुताबिक, नवीना का पहला गर्भ 3 साल पहले धर्मगढ़ के इसी अस्पताल में ऑपरेशन से हुआ था, जिसके लिए 85,000 रुपए का भुगतान सोना-चांदी बेचकर किया गया था। इस बार प्रसव पीड़ा होने पर उन्होंने स्थानीय उपस्वास्थ्य केंद्र से संपर्क नहीं किया, क्योंकि पिछली बार उन्होंने भर्ती करने से इनकार कर दिया था। बहू के आंध्र प्रदेश से लौटने के बाद मितानिन एक-दो बार आईं, लेकिन कोई कार्ड या सरकारी देखरेख नहीं मिली। इसलिए, उन्होंने एक वाहन किराए पर लेकर ओडिशा जाने का फैसला किया, ताकि दोबारा ऑपरेशन से बचा जा सके। परिवार सामान्य प्रसव के लिए अस्पताल की मांग पूरी करने को तैयार था, लेकिन इतनी अधिक राशि की मांग की गई थी। जिला पंचायत अध्यक्ष ने की मदद जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने बताया कि लाचार सास 2 दिन से पैसे की तलाश कर रही थी। कारण सुनते ही अस्पताल में प्रतिनिधि भेजा गया जहां उनको 2 घंटे तक इंतजार कराया गया, फिर मां और नवजात को देवभोग के एंबुलेंस में बैठाकर वापस लाया गया। इस संबंध में जांच के लिए CMHO को निर्देशित किया जाएगा। अस्पताल संचालक की सफाई मामले में अस्पताल संचालक चैतन्य मेहेर ने सफाई देते हुए कहा कि, उन्हें किसी भी प्रकार से किसी पैसे की मांग नहीं की गई। उनके द्वारा हमें दिक्कतों की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। जब तक रही स्टाफ ने उनका पूरा ख्याल रखा है। अगर वे पैसों की दिक्कत बताते तो उन्हें पहले ही जाने दे दिए होते, पर उन्होंने अंतिम समय तक कुछ भी नहीं बताया। जच्चा बच्चा कार्ड नहीं था मितानिन गांव में उस वार्ड की मितानिन पार्वती ध्रुव ने बताया कि, 6वां महीने के गर्भ में वो गांव आई। 7 वे महीने में जांच की गई। जरूरी दवाएं और पौष्टिक आहार दिया गया था। पंजीयन कार्ड खत्म हो गया था, इसलिए उसका जच्चा बच्चा कार्ड नहीं बनाया जा सका। पहले प्रसव सिजेरियन था, इसलिए दूसरे में भी वो उसी अस्पताल चल दी। किसी को इसकी जानकारी नही थी। BMO को जानकारी नहीं मैनपुर बीएमओ गजेंद्र ध्रुव ने कहा कि ये सब जानकारी मीडिया के माध्यम से मिल रही है। मुझे पता नहीं था। मामला क्या है पता करवाता हूं और स्थिति की जानकारी लेता हूं। सरकारी योजना से वंचित है भुजिया परिवार 2000 की आबादी वाले इस गांव में दोषो बाई का परिवार अकेला भूंजिया जनजाति से है। गांव के बीच टूटे हुए मकान में सास बहू रहते हैं। रोजगार का अभाव था इसलिए बेटा आंध्र काम करने जाता है। गांव कलस्टर में शामिल नहीं इसलिए विशेष पिछड़े जनजाति योजना का लाभ इस परिवार को नहीं मिल रहा। पीएम आवास के तहत आवास मिला है पर बना नहीं पा रहे हैं। बूढ़ी सास मजदूरी कर किसी तरह गुजारा कर रही ,परिवार के लिए मजदूरी ही अंतिम विकल्प था।

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