जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में BCCI उठे तीखे सवाल:नंदन कामथ बोले- “भारतीय खिलाड़ी भारत के लिए नहीं, बीसीसीआई के लिए खेलते हैं”

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन “द स्पिरिट ऑफ द गेम” सेशन में खेल प्रशासन, खिलाड़ियों के अधिकारों और खेलों में सुधार को लेकर तीखी चर्चाएं हुईं। पैनल में शामिल पैरालिंपियन दीपा मलिक, खेल कानून विशेषज्ञ लॉयर नंदन कामथ और एक्टर-स्पोर्ट्स एंबेसडर राहुल बोस ने खेलों के प्रति नीतिगत रवैये और व्यवस्थागत खामियों पर खुलकर अपने विचार रखे। बीसीसीआई की सोच चले तो धोनी को हेलिकॉप्टर शॉट का पेटेंट मिल जाए – नंदन कामथ सेशन के दौरान नंदन कामथ ने भारतीय खेल स्ट्रक्चर और खिलाड़ियों के अधिकारों पर बात करते हुए कहा कि खेल सिर्फ एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक संपत्ति है। उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा- अगर बीसीसीआई की सोच चले, तो एमएस धोनी को हेलिकॉप्टर शॉट का पेटेंट लेने की इजाजत मिल जानी चाहिए, क्योंकि वे इसे करने वाले पहले खिलाड़ी थे।” उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय क्रिकेट टीम भारत के लिए नहीं, बल्कि बीसीसीआई के लिए खेलती है। सुप्रीम कोर्ट में बीसीसीआई का रुख यह दिखाता है कि संस्था खिलाड़ियों को नियंत्रित करना चाहती है। नंदन कामथ ने खेलों में एक मजबूत गवर्नेंस सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि भारत में कई खेल ऐसे हैं जिनमें हम अभी भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा तक नहीं पहुंच पाए हैं। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि खेलों को स्कूल एजुकेशन में अनिवार्य किया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा मेडल देश में आ सकें। “सरकारी नीतियों की सीमाएं थीं, हाईकोर्ट तक जाना पड़ा” – दीपा मलिक पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट दीपा मलिक ने अपने संघर्षों और पैरालंपिक खेलों में सुधारों पर बात की। उन्होंने बताया कि जब उन्हें 2015 में टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) में शामिल किया गया, तभी उनके करियर में बड़ा बदलाव आया। इस स्कीम के तहत उन्हें प्रोफेशनल ट्रेनिंग और सपोर्ट मिला, लेकिन सरकारी नीतियों की कुछ सीमाएं थीं, जिसके कारण उन्हें अपने बायोमैकेनिक ट्रेनर को हायर करने के लिए हाईकोर्ट तक जाना पड़ा। उन्होंने पैरालंपिक खेलों के बढ़ते कद पर बात करते हुए बताया कि 1968 से 2016 तक भारत ने सिर्फ 12 मेडल जीते थे, जबकि 2021 पैरालंपिक में यह संख्या 48 हो गई। उन्होंने TOPS स्कीम का नाम बदलने की मांग की ताकि यह केवल “ओलंपिक” तक सीमित न रहे, बल्कि “टार्गेट ओलंपिक और पैरालंपिक पोडियम स्कीम” बनकर समावेशिता को दर्शाए। “महिला खिलाड़ी घर में सबसे बाद में खाती हैं, इससे न्यूट्रिशन प्रभावित होता है” – राहुल बोस राहुल बोस ने खेलों में न्यूट्रिशन और सही प्लानिंग की कमी को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कीं। उन्होंने कहा कि कई छोटे शहरों और गांवों में खिलाड़ी सही डाइट तक नहीं ले पाते। “जब मैंने नेशनल लेवल की महिला खिलाड़ियों से उनकी डाइट के बारे में पूछा, तो शुरुआत में कोई खुलकर कुछ नहीं बोला, लेकिन बाद में पता चला कि कई महिला खिलाड़ी अपने घर में सबसे बाद में खाती हैं, जिससे उनका पोषण प्रभावित होता है।” उन्होंने खेल संघों की जवाबदेही पर भी सवाल उठाया और कहा कि फेडरेशन को पूरी आजादी चाहिए, लेकिन उनके ऊपर जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। खेल संघों का काम केवल खिलाड़ियों को अवसर देना है, न कि गरीबी दूर करना या सामाजिक सुधार करना। खेलों की सफलता सिर्फ मेडल से नहीं, बल्कि ‘तीन एफ’ – फन, फ्रेंड्स और फिटनेस से मापी जाए नंदन कामथ ने खेलों के इकोसिस्टम और व्यापक प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत में 75% युवा पर्याप्त रूप से शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं। उन्होंने कहा कि खेलों की सफलता को केवल ओलंपिक और पैरालंपिक मेडल तालिका से नहीं आंका जाना चाहिए। “हमें खेलों का रिपोर्ट कार्ड ‘तीन एफ’-फन, फ्रेंड्स और फिटनेस के आधार पर मापना चाहिए। यानी ज्यादा से ज्यादा भारतीय खेलों से जुड़ें, इससे आनंद लें, दोस्त बनाएं और फिट रहें। राहुल बोस ने खेल संरचना के भविष्य पर बात करते हुए कहा कि अगले 10 सालों में खेलों की दिशा ज्यादा स्पष्ट और संगठित होगी। उन्होंने कहा कि हर खेल के लिए इंडिविजुअल लीग मॉडल काम नहीं करता और कई लीग गलत फाइनेंशियल प्लानिंग की वजह से असफल हुई हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के इस सेशन में खेल प्रशासन, खिलाड़ियों के अधिकार और नीति-निर्माण से जुड़े कई अहम मुद्दे उठे। पैनलिस्टों ने स्पष्ट किया कि खेलों में सुधार केवल सुविधाएं बढ़ाने से नहीं, बल्कि सोच और नीति में बदलाव लाने से होगा। “द स्पिरिट ऑफ द गेम” सेशन में खेल जगत से जुड़ी हस्तियों में नंदन कामथ, दीपा मलिक और राहुल बोस ने हिस्सा लिया

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