सूखते तालाब, सिमटता जल और बढ़ता शहर

नदियों के साथ ही यहां का तालाब भीलवाड़ा वासियों के लिए शुद्ध जल का प्रमुख स्रोत हुआ करता था। बाद में ये तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए और सिमटते चले गए। कभी तालाबों, बावड़ियों और नालों के सहारे अपनी जल जरूरतें पूरी करने वाला भीलवाड़ा अब शुद्ध और स्वच्छ जल से भरे तालाबों को देखने के लिए तरस रहा है। शहर का विस्तार, बढ़ती आबादी, अतिक्रमण और बदलती जीवनशैली ने सभी पारंपरिक जल स्रोतों को लगभग समाप्त कर दिया है, जो कभी नगर की पहचान और जीवनरेखा हुआ करते थे। भीलवाड़ा नगर का प्रारंभिक विकास तालाबों और प्राकृतिक जल निकायों के आसपास हुआ। ये तालाब न सिर्फ पेयजल का स्रोत थे, बल्कि भूजल रिचार्ज, पशुपालन, खेती और सामाजिक जीवन का भी आधार थे। शहर की बसावट इन्हीं जल स्रोतों को ध्यान में रखकर हुई थी। तालाबों की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण अतिक्रमण रहा। जलग्रहण क्षेत्र में निर्माण, तालाबों की पाल पर बसावट और प्राकृतिक जल प्रवाह में रुकावट ने इन जल स्रोतों को कमजोर कर दिया। शहर का विकास जल संरचनाओं को बचाए बिना होता गया। तालाबों के खत्म होने से केवल पानी की समस्या ही नहीं बढ़ी, बल्कि पर्यावरण संतुलन भी बिगड़ा। गर्मी बढ़ी, हरियाली घटी और शहर की प्राकृतिक ठंडक समाप्त होती चली गई। कभी सामूहिक जीवन का केंद्र रहे तालाब आज केवल नाम मात्र रह गए हैं। गांधीसागर |भीलवाड़ा का बड़ा तालाब कभी शहर का प्रमुख जल स्रोत था। बाद में इसका नाम गांधी सागर तालाब रख दिया गया। इसका प्राकृतिक भराव क्षेत्र 2 वर्ग किमी क्षेत्र तक विकसित था। इसके भराव क्षेत्र में वर्षा जल संग्रह होता था और आसपास के कुएं इसी तालाब से रिचार्ज होते थे। बारिश में जब यह ओवरफ्लो होता था तो इसका पानी दूर कांवाखेड़ा तक पहुंच जाता था। शास्त्री नगर, मोहम्मदी कॉलोनी, भवानी नगर, वैभव नगर, सिंधु नगर, गर्ल्स कॉलेज, हनुमान नगर आदि कॉलोनियां जो आज बसी हुई हैं, ये सभी तालाब की जगह पर अतिक्रमण करके ही बसाई गई है। सबसे पहले इसके भराव क्षेत्र में वर्ष 1952 में सिंधुनगर बसाया गया, फिर 1973 में कन्या महाविद्यालय बनाया गया था। इसके बाद वर्ष 1975 के बाद शास्त्रीनगर के मेन सेक्टर की योजना यूआईटी ने बनाई और धीरे-धीरे पूरा शास्त्री नगर यहां बसा दिया। स्रोत : डॉ. संतोष आनंद के निर्देशन में सुषमा घारू की रिसर्च रिपोर्ट धान्धोलाई तालाब | यह प्राकृतिक बड़ा जलभराव क्षेत्र शहर के उत्तरी सीमा पर था। बारिश में इसमें पानी भरता था, लेकिन कम गहरा होने के कारण दिसंबर तक इसका पानी सूखने लगता था और यहां धान की फसल पैदा की जाती थी। इसका नाम धान तलाई था। अपभ्रंश होकर अब यह धान्धोलाई बन गया। इस तलाई का भराव क्षेत्र संजय कॉलोनी से कृषि मंडी तक आता था। इसका विस्तार आरके कॉलोनी और आरसी व्यास कॉलोनी तक था। आज छोटी सी तलाई बन कर रह गई। पुर तालाब | पुर गांव भीलवाड़ा से अलग एक बड़ी बस्ती थी। इस बस्ती के चारों ओर छोटे-बड़े कई तालाब हैं। यहां मौजूद तालाब आसपास की बस्ती की जल जरूरतों को पूरा करता था। बाद में शहरी विस्तार के साथ यह तालाब भी सिकुड़ता चला गया। यह तालाब स्थानीय जरूरतों के लिए बेहद उपयोगी रहा। मरड़िया नाड़ा | यह जल स्रोत छोटा लेकिन महत्वपूर्ण था। इसका नामकरण मरड़े युक्त मिट्‌टी की अधिकता के कारण पड़ा था। यह नाड़ा बरसात के पानी से भरता है, जो पशुओं के पीने के काम आता था। इस नाड़े की मिट्‌टी पुरातन काल में कच्चे घरों के निर्माण व लीपने के काम में ली जाती थी। लगभग एक वर्ग किमी में फैला यह जल भराव स्रोत आज पूरी तरह से अवैध बस्ती में तब्दील हो चुका है। मठड़ा नाला कभी एक महत्वपूर्ण जलधारा थी, जिससे आसपास के क्षेत्र में पानी उपलब्ध होता था। छोटा तालाब (बंधा तालाब) | शहर की एक और प्रमुख जल इकाई छोटा तालाब, जिसे बंधा तालाब भी कहा जाता है, बड़ा तालाब भरने के बाद बंधा अतिरिक्त जल को संचित करता था। यह तालाब बड़ा तालाब से नीचे बनाया गया था। यह बंधा मेवाड़ रियासत ने जनहित में बनवाया था, पूरे तालाब में पक्के घाट बनाए गए थे। बाद में यह तालाब भी गाद, अतिक्रमण और उपेक्षा का शिकार हो गया और धीरे-धीरे भरता चला गया। तालाब के किनारे प्राचीन कोट को जो भीलवाड़ा नगर की सीमा सुरक्षित रखता था, आज उसे गिरा कर मकान बना लिए हैं। भास्कर रिसर्च रिपोर्ट| तालाबों, बावड़ियों से जल जरूरतें पूरी करने वाले शहर के जलस्रोतों में शुद्ध पानी नहीं बचा

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