राजस्थानी लोक कला, भपंग वादक और पांडुन का कड़ा को नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात लोक कलाकार गफरूद्दीन मेवाती जोगी को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें मेवात की विलुप्त होती लोक परंपराओं को जीवित रखने और देश-विदेश तक पहुंचाने के लिए प्रदान किया गया है। गफरूद्दीन मूल रूप से भरतपुर जिले के कैथवाड़ा गांव के निवासी हैं। पिछले करीब 20 सालों से अलवर में रह रहे हैं। उनका जन्म मेवाती जोगी समुदाय में हुआ, जहां लोक संगीत पीढ़ियों से साधना का हिस्सा रहा है। 20 मेवाती लोक वाद्यों का ज्ञान गफरूद्दीन बताते हैं कि उन्होंने मात्र चार साल की उम्र में भपंग वादन सीख लिया था। सात साल की उम्र में पांडुन का कड़ा अपने पिता से सीखना शुरू किया। उनके पिता बुद्ध सिंह जोगी स्वयं सिद्धहस्त सारंगी वादक थे। लगभग 20 मेवाती लोक वाद्यों का ज्ञान रखते थे। 65 साल की उम्र मे भी पूरी ऊर्जा से भपंग बजाते हैं गफरूद्दीन के परिवार में आठ पीढ़ियों से सारंगी और भपंग वादन की परंपरा चली आ रही है, जिसे उन्होंने बचपन से आत्मसात किया। 68 साल की उम्र में भी गफरूद्दीन की कला में वही ऊर्जा और प्रभाव दिखाई देता है। जब वे भपंग की धुन के साथ पांडुन का कड़ा प्रस्तुत करते हैं। महाभारत की कथाओं को सुरों में पिरोते हैं। उनके पास 2500 से अधिक दोहों का दुर्लभ ज्ञान है, जिसके कारण उन्हें इस लोक कला का एकमात्र जीवित प्रतिनिधि माना जाता है। हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय की अनूठी झलक देखने को मिलती गफरूद्दीन मेवाती जोगी ने देश ही नहीं, बल्कि कई देशों में अंतरराष्ट्रीय मंचों और सांस्कृतिक उत्सवों में भारत की लोक कला का प्रतिनिधित्व किया है। उनके गायन में हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय की अनूठी झलक देखने को मिलती है, जो मेवात क्षेत्र की गंगा-जमुनी तहज़ीब को दर्शाती है। ये सम्मान मिल चुके इससे पहले भी गफरूद्दीन को कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं।वर्ष 2016 में भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान उन्हें राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।वर्ष 2024 में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया गया।अब पद्मश्री सम्मान मिलने से उनके दशकों के संघर्ष, साधना और लोक कला के प्रति समर्पण को देश की सर्वोच्च मान्यता मिली है। गफरूद्दीन को पद्मश्री मिलने की खबर से अलवर, भरतपुर और पूरे मेवात क्षेत्र में खुशी की लहर है। कला प्रेमियों और लोक कलाकारों ने इसे राजस्थानी लोक विरासत की जीत बताया है। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों के लिए लोक कला को सहेजने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा बनेगा।


