साल 2026 के पद्म अवॉर्ड्स का गृह मंत्रालय द्वारा आधिकारिक घोषणा कर दी गई है। इस साल 45 लोगों को पद्मश्री सम्मान दिया जाएगा। इनमें मध्य प्रदेश की चार हस्तियां शामिल हैं। भोपाल के लेखक कैलाश चंद्र पंत, सागर के मार्शल आर्ट कलाकार भगवानदास रैकवार, मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर और पुरातत्वविद् उज्जैन के नारायण व्यास को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। कैलाश चंद्र पंत को पद्मश्री की घोषणा के साथ ही उनके भोपाल स्थित घर में खुशी का माहौल है। कैलाश चंद्र पंत के घर बड़े दामाद देवेश जोशी, बेटी प्रीति जोशी, छोटे दामाद अनुराग जैन, बेटी निवेदिता जैन पहुंचे और मिठाइयां बांटीं। वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और सांस्कृतिक चिंतक कैलाश चंद्र पंत और मोहन नागर से दैनिक भास्कर की हुई बातचीत में उन्होंने अपने जीवन और अपने समर्पण पर विस्तार से चर्चा की।
कैलाश चंद्र पंत से बातचीत के मुख्य अंश-
सवाल: आपको यह सम्मान दिया जा रहा है कैसा अनुभव है?
पंत: एक राष्ट्रीय सम्मान मिलता है तो गौरव की बात है। गर्व तो होता ही है। घर के बच्चे परिवार के लोग सब बड़े प्रसन्न हैं। उस प्रसन्नता से भी एक आनंद मिलता है। मित्रों के फोन की झड़ी लगी हुई है।
सवाल: आपको इसकी जानकारी सबसे पहले कैसे मिली किसने फोन किया था?
पंत: आज सुबह होम मिनिस्ट्री से एक फोन आया था। सुबह 9:30 बजे उन्होंने मुझे बताया कि आपको बताया मैं गृह मंत्रालय से बोल रहा हूं। उन्होंने कहा कि आप अपनी ईमेल आईडी भेज दीजिए। मैंने कहा कि मेरी कोई ईमेल नहीं है फिर मैंने बेटी से बात कराई। उन्होंने कहा कि आपको पद्मश्री शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में मिल रहा है, मैंने धन्यवाद दिया। सवाल: अपने अपने जीवन का सफर कहां से शुरू किया था और क्या-क्या चुनौतियां रही?
पंत: मिशन 1936 में महू में जन्म हूं यानी अब अप्रैल में 90 साल पूरे कर रहा हूं। कायदे से बूढ़ा हो चुका हूं। मैं स्कूल के दिनों से ही सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहा मेरी संस्कार भूमि आर्य समाज है। मेरे ताऊजी आर्य समाजी थे। वह मेरे अभिभावक थे,उनके साथ सन्यासियों के प्रवचन सुनने जाता था हवन में बैठते थे आर्यवीर दल में भाग लेते थे, उसके बाद जब स्कूल में आ गए मतलब तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में स्वयंसेवक बने वहां भी सेवा का अवसर मिला। आज एक राज खुल रहा हूं जो मैंने अब तक किसी को नहीं बताया 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति को संघ के सत्याग्रह के दौरान में गिरफ्तार हो गया था मात्र 13 साल की मेरी उम्र थी।
सवाल: यह बात आपके घर के लोगों को पता थी कि आप गिरफ्तार हुए हैं?
पंत: घर के लोगों को बताते मैं घर के लोगों को बात कर नहीं गया था बल्कि हमारे घर के पड़ोस में एक पंजाबी परिवार था। पता नहीं उनकी मिसेज को कैसे अंदाजा था। उन्होंने पहली बार उन्होंने पहली बार मकर संक्रांति का बहाना करके हमें टीका लगाया और लड्डू खिलाया हम दो भाई सत्याग्रह में गए थे। पता नहीं उन्हें कैसे पता चल गया हमारे घर पर तो खबर बहुत रात में पहुंची जब हम थाने में बंद हो गई। उसके बाद दूसरे रोज छुट्टी थी। फिर जब कोर्ट खुली तो पेशी हुई फिर हमें जेल भेज दिया। जज साहब ने हमारी उम्र देखी नहीं वरना हम निश्चित रूप से छूट जाते। सत्याग्रह के दौरान हम तीन लोग थे। नारायण राव उसे समय हमारे नेता थे। उनके साथ हम लोग गए थे। नारे लगाते हुए शहर में घूम रहे थे। पुलिस ने घेरा डाला और हमें गिरफ्तार कर लिया। हम चले गए। फिर आरोप पत्र पेश हो गया। उसमें मेरी उम्र 13 वर्ष और मेरे भाई की उम्र 14 वर्ष थी। महेश शर्मा हमने नारे लगा दिए कि हमारे साथ न्याय हो शीघ्र हो वह मजिस्ट्रेट साहब विदक गए। उन्होंने 2 महीने की सख्त सजा दे दी हम लोग जेल चले गए, लेकिन हम लोग जेल पहुंचे ही थे। उसके दो-तीन घंटे बाद हमारे बरी होने के ऑर्डर आ गए। मैं केवल यह बताना चाहता हूं कि जीवन की गतिविधियां और सक्रियता उसे समय थी जब 13- 14 साल की उम्र थी। जेल से छूटने के बाद यह दिक्कत आई कि जो लोग संघ के सत्याग्रह में भाग लिए हैं, उनको वापस स्कूल में दाखिला नहीं दिया जाएगा। बाहर कर दिया जाएगा, लेकिन हमारे परिवार का शिक्षा जगत से संबंध था। हमें वह दिक्कत नहीं हुई और काम चला रहा संघ से प्रतिबंध हटा हमने कार्यक्रमों में जाना शुरू कर दिया। 1950 में एक गो हत्या हो गई। उसमें आक्रोश हुआ और हमने छात्रों की हड़ताल कर दी। उन दिनों स्कूल में प्रार्थना होती थी। जैसे ही वह प्रार्थना खत्म हुई हमने हेड मास्टर की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए भाषण दे दिया कि हमारे लिए हिंदू, हम हिंदुओं के लिए। गाय माता के तुल्य हैं। उसकी हत्या राष्ट्रपिता की हत्या के समान है। यह कहा और लड़के बाहर निकल गए। हेड मास्टर बहुत नाराज हो गए, लेकिन टीचर्स ने उनसे कह दिया कि यह विचारों से हिंदूवादी है। उसके बाद हमने मैट्रिक पास की और कॉलेज ज्वाइन किया। हम कॉलेज में राजनीति में सक्रिय हो गए। इंदौर की राजनीति में सुरेश सेठ चमकते सितारे थे। नारायण प्रसाद शुक्ला यज्ञ दत्त शर्मा यह लोग बड़े चमकदार लोग थे। सवाल: भोपाल में आपकी पत्रकारिता के दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
पंत: सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि जब साप्ताहिक समाचार निकला तो उसके विशेष अंक मालवा विशेषांग निर्माण विशेषांक, छत्तीसगढ़ विशेषांक, बुंदेलखंड विशेषांक, के विशेष अंक निकले। तंत्र-मंत्र विशेषांक भी मैंने निकाला। शंकराचार्य विशेष अंक भी आदि गुरु शंकराचार्य को लेकर प्रकाशित किया। इस तरह के जो विशेष अंक थे उन्होंने लोगों का ज्ञान विशेष रूप से आकर्षित किया। उन दिनों अखबारों में साहित्यिक धार्मिक और सांस्कृतिक खबरों का अभाव रहता था। मैं राजनीतिक तो पहले और अंतिम पेज में लिखना था, लेकिन 16 पेज के साप्ताहिक अखबार में विशेष अंकों को प्राथमिकता दी।
उसके बाद मैंने अक्षर नाम की साहित्यिक पत्रिका निकाली। समाज को सकारात्मक संदेश देने वाली रचनाओं को चयन करके नरेश मेहता विशेषांक निकाला। सवाल: आपके परिवार में कौन-कौन हैं?
पंत: हमारे परिवार में हम सात भाई साथ भाई थे, अब हम ही रह गए हैं। तीन भाई दिवंगत हो गए हैं। एक भाई बहुत बड़े अभी भी 9495 साल के हैं। उनके बाद में हूं सब लोग शिक्षा से जुड़े रहे मेरी तीन बेटियां हैं, तीनों पुत्री की शादी हो गई है। बीच वाली पुत्री के घर में अभी मैं मौजूद हूं।
कैलाश चन्द्र पंत का परिचय
वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और सांस्कृतिक चिंतक कैलाशचन्द्र पंत हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में दशकों से सक्रिय रहे हैं। उनका जन्म 26 अप्रैल 1936 को महू, जिला इंदौर (मध्यप्रदेश) में हुआ। उन्होंने एम.ए., साहित्याचार्य और साहित्य रत्न की उपाधियां प्राप्त कीं।
शैक्षणिक एवं प्रशासनिक अनुभव
श्री पंत ने अपने कार्य जीवन की शुरुआत शिक्षा और प्रशिक्षण से की। वे यूनियन थियोलॉजिकल सेमिनरी, इंदौर में 1957 से 1959 तक व्याख्याता रहे। इसके बाद पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र, भोपाल में 1963 से 1971 तक प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। वे विद्या भवन (एन.सी.ई.आर.टी.), उदयपुर में 1959–60 के दौरान प्रकाशन प्रमुख रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने दैनिक इंदौर समाचार (1972–77) में संवाददाता के रूप में कार्य किया।
संपादन के क्षेत्र में भी उनकी सशक्त उपस्थिति रही। वे सोशलिस्ट कांग्रेसमैन, दिल्ली (1961–62) के सह-संपादक रहे। इसके बाद दैनिक नव भारत, भोपाल (1962) तथा दैनिक नव प्रभात, भोपाल (1962–63) में भी संपादकीय दायित्व निभाए। श्री पंत ने मासिक ‘शिक्षा प्रदीप’ (भोपाल, 1963–64), साहित्यिक ‘जनधर्म’ (भोपाल, 1977–98), साहित्यिक ‘दुर्गामी आवाज’ (इंदौर, 2000–01) तथा त्रैमासिक पत्रिका ‘अक्षरा’ (भोपाल, 2003 से निरंतर) का सफल संपादन किया।
सम्मान और अलंकरण साहित्य भूषण सम्मान यह गर्व का पल है कि बैतूल जिले का नाम आया: नागर पद्मश्री अवॉर्ड के लिए चयनित मोहन नागर राजधानी पहुंचे और कहा कि यह जानकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि भारत सरकार के किसी अवॉर्ड में बैतूल का नाम आया है। हमने बैतूल जिले में जो अभियान शुरू किया। बैतूल जिले की 75 पहाड़ियों को हरा–भरा करने का प्रयास कर रहे हैं। 16 पहाड़ियों को हरा–भरा कर दिया है। वाचा गांव में लोगों ने किस तरह मिलकर समाज के लिए बेहतर कार्य किया है वह सभी देख सकते हैं। अब यह पूरे बैतूल जिले के लिए गर्व का पल है। आज नदियों के घाटों की स्वच्छता का कार्य किया जा रहा था उसी दौरान मुझे इस अवॉर्ड की जानकारी मिली है। पिछले एक–डेढ़ साल से हम एमपी की पंचायतों में जल संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण बैतूल में शिक्षा और जल संरक्षण का कार्य था। वहां पानी ठहरता नहीं था। सैंकड़ों गांव में हम गांवों तक पैदल–पैदल पहुंचे। तब हमने समाज को साथ लेकर चुनौतीपूर्ण कार्य पर विजयी पाई। नाम- मोहन नागर पिता- स्व भंवरलाल लाल नागर
जन्मतिथि- 23-02-1968
शिक्षा- एम. ए. राजनीति विज्ञान, (विक्रम यूनिवर्सिटी उज्जैन)
उपाध्यक्ष मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद
(योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग, मध्यप्रदेश शासन)
-सचिव भारत भारती शिक्षा संस्थान, बैतूल
प्रमुख सम्मान देश की धरोहरों को जानें देश पीढ़ी, यही उद्देश्य है: नारायण व्यास नारायण व्यास उज्जैन के हैं। हालांकि वे भोपाल में भी रहते हैं। उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत करते हुए पद्मश्री मिलने की सूचना पर प्रसन्नता जाहिर की। नारायण व्यास ने कहा कि जो अवॉर्ड मिला है यह देश के लिए काम करने के लिए ही मिला है। मैंने पुरातत्व के क्षेत्र में काम किया है। इसके अलावा मूर्तिकला, चित्रकला में भी काम किया है। मेरा मुख्य काम पुरातत्व के क्षेत्र में काम करना है। उद्देश्य यही है कि देश की धरोहरों को हमारी पीढ़ी जानें और कैसे इन्हें संरक्षित करें। शासन तो इनके लिए काम करता ही है लेकिन लोगों की भी जिम्मेदारी है कि इन्हें कैसे सुरक्षित करें। हम लोगों को जागरूक करने का भी काम करते हैं। हमने पूरे देश में अलग–अलग पुरातत्व के लिए काम किया है। मैं 2009 में रिटायर हुआ था जिसके बाद से मैं लगातार पुरातत्व के लिए काम कर रहा हूं। सौ रुपए के नोट के पीछे छपे फोटो का रेनोवेशन नारायण व्यास ने कराया
नारायण व्यास उज्जैन में ही पले बढ़े। उनके भाई ने बताया कि उनकी उज्जैन में शिक्षा हुई। 1972 में दिल्ली से स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी से पीजी डिप्लोमा किया। उसके बाद ASI (आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया) में टेक्निकल असिस्टेंट के तौर पर पदस्थ हुए। फिर प्रमोट होते हुए सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट बने। जब डिप्टी सुप्रिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट रहते बडौदा में रानी की बाव का एक्टेंशन किया था। आज 100 रुपए के नोट के पीछे जो फोटो छपा हुआ है वो इनका ही एक्सटेंशन किया हुआ है।
कई पुरस्कार मिले लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में इनका नाम है। इनके पास ईंटों का कलेक्शन है। मप्र का वाकणकर सम्मान मिला है। सबसे बड़ा सम्मान पद्मश्री मिलने जा रहा है।
भीमबेटका के रूप में इन्होंने सबसे बड़ा काम किया। भीमबेटका को विश्व धरोहर बनाया गया। बहुत मेहनत की। कई बार तो इनसे बात ही नहीं हो पाती थी। इन्होंने रिमोट एरिया में काम किया। भीमबेटका के जंगलों में घूमते हुए इनके पैर में जहरीला कांटा लग गया था इनका पैर नीला पड़ने लगा था। फिर एक बाबा जी ने दवा का लेप लगाया तब ठीक हुए।
हमारे पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। इनकी शुरु से आदत थी कि दीवार पर कोयला, पेंटिंग और चॉक जो मिल जाए उससे पेंटिंग बना देते थे। कागज को काटकर कलाकारी करते थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के गांव की मिट्टी का कलेक्शन है बुक्स का कलेक्शन है। लाला लाजपत राय की लिखी हुई किताब इनके पास है। उस पर लाला लाजपत राय के दस्तखत हैं।


