दस जनवरी को छिंदवाड़ा के परसगांव में सामने आई घटना ने मातृत्व और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज को झकझोर दिया। ढाई साल की बच्ची की हत्या करने वाली मां का बयान सुनकर गांव के लोग आज भी सन्न हैं। पुलिस पूछताछ में महिला ने बताया कि वह बच्ची के रोने को सहन नहीं कर पा रही थी और गुस्से में उसने उसका गला घोंट दिया। भावनात्मक असंतुलन ने उसे इस कदर विचलित कर दिया कि वह मातृत्व की ममता तक भूल गई। यह सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि देशभर में तेजी से उभरती उस गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या की ओर इशारा करता है, जिसमें महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद अवसाद और असहनीय मानसिक दबाव से गुजर रही हैं। इसे चिकित्सा भाषा में पोस्टपार्टम डिसऑर्डर कहा जाता है और विशेषज्ञों के अनुसार इसका बढ़ता दायरा परिवार और समाज के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के आंकड़ों व विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था और डिलीवरी के बाद 10 में से 2 महिलाएं इस समस्या से गुजरती हैं। समस्या यह है कि परिवार इसे सामान्य मूड स्विंग मानकर नजरअंदाज कर देता है, जबकि समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति बच्चे की परवरिश को प्रभावित करने से लेकर उसकी जान के लिए भी घातक साबित हो सकती है। सोशल मीडिया से बढ़ा पोस्टपार्टम डिप्रेशन
गर्भावस्था के दौरान और डिलीवरी के बाद का समय महिलाओं के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद संवेदनशील होता है। गांधी मेडिकल कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी के अनुसार आज गर्भवती महिलाएं सोशल मीडिया के कंटेंट, तुलना, डर और गलत जानकारी के कारण पहले से ज्यादा तनाव में हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के मन में सवाल आते हैं कि किस तरह की डिलीवरी होगी, बच्चा कैसा होगा, मैं मोटी दिख रही हूं, मेरी जैसी दूसरी महिलाएं कैसे संभाल रही हैं। इस तरह की तुलना महिलाओं में आत्मग्लानि, डर और निराशा को बढ़ाती है। इस दौरान जब उन्हें परिवार से सपोर्ट नहीं मिलता तो यही बदलाव पोस्टपार्टम डिप्रेशन और कई मामलों में पोस्टपार्टम साइकोसिस तक में बदल जाता है। ओपीडी में एक-दो महिलाएं इसी समस्या के चलते आती हैं। पति की भूमिका तय करती है मानसिक भविष्य
भोपाल के वरिष्ठ स्त्री-रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय हलदर बताते हैं कि जर्नल ऑफ बायोसोशल साइंस की रिपोर्ट में पाया गया है कि गर्भावस्था से लेकर बच्चे के जन्म तक पति की मौजूदगी से महिला व नवजात दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे प्रसव के दौरान दर्द कम होता है, महिलाओं की निर्णय क्षमता बढ़ती है, मानसिक तनाव घटता है। पोस्टपार्टम डिसॉर्डर की संभावना भी कम रहती है। डॉ. हलदर ने कहा कि 90% महिलाएं अस्पताल पति के बिना पहुंच रही हैं, जबकि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत उसी दौरान भावनात्मक सहारे की होती है। ओपीडी में हर महिला को यही सलाह देता हुं कि वे अगली बार अपने पति के साथ फॉलोअप के लिए आएं। इस प्रक्रिया के दौरान कपल के साथ होने से मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर बेहतर असर होता है। बच्चों की हत्या के चर्चित मामले
केस- MP में 8 वर्षीय बेटे की गला दबाकर हत्या कर दी
सीधी जिले में मानसिक रूप से अस्थिर बताई जा रही महिला फूल कुमारी बैगा ने अपने 8 वर्षीय बेटे की गला दबाकर हत्या कर दी। घटना ग्राम कतरी काड़ी की है, जहां मां और बेटा 4 अक्टूबर की शाम से लापता थे। अगले दिन चरवाहों को गांव से एक किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बच्चे का शव मिला, जिसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। मौके पर पहुंची मां ने पूछताछ में हत्या की बात स्वीकार कर ली। ग्रामीणों के अनुसार आरोपी महिला लंबे समय से मानसिक रूप से परेशान थी। पुलिस ने हत्या का केस दर्ज कर जांच शुरू की है और मां को जेल भेज दिया। दो केस अन्य राज्य से भी आए सामने ये खबरें भी पढ़ें… एम्स डायरेक्टर ने की कैंसर की तीन सर्जरी एम्स भोपाल में कैंसर के मरीजों के लिए दो नई सर्जिकल प्रक्रियाएं थोराकोस्कोपिक इसोफेगेक्टॉमी और लैप्रोस्कोपिक स्टमक ट्यूब रिकंस्ट्रक्शन शुरू हुईं हैं। अब तक मरीजों को इन सर्जरी के लिए दिल्ली-मुंबई जैसे मेट्रो शहरों का रुख करना पड़ता था। मुख्य रूप से आहर नली के कैंसर से जुड़ी यह सर्जरी बेहद जटिल मानी जाती हैं। एम्स भोपाल में पहली बार यह सर्जरी संस्थान के नए डायरेक्टर डॉ. माधवानंद कर ने की हैं। पूरी खबर पढ़ें बच्चेदानी की जगह ट्यूब में बढ़ रहा बच्चा 22 साल की सोनाली (बदला हुआ नाम) अस्पताल की सीढ़ियां उतर रही थी कि अचानक उसे कमजोरी महसूस हुई और वह चक्कर खाकर गिर पड़ी। डॉक्टरों की एक टीम तुरंत उसे उठाकर इमरजेंसी में ले गई। शुरुआती जांच के बाद जब उसका प्रेग्नेंसी टेस्ट किया गया तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। सोनाली गर्भवती तो थी, लेकिन उसका बच्चा गर्भाशय की जगह फैलोपियन ट्यूब (अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ने वाली एक पतली नली) में विकसित हो रहा था। पूरी खबर पढ़ें


