50 साल पुराना पटेल ब्रिज जर्जर हालत में पहुंच गया है। ब्रिज पर सड़क में दरार है तो फुटपाथ की टाइल्स उखड़ने लगी है। जवाहर मार्ग पर बना यह ब्रिज पूर्वी और पश्चिमी शहर को जोड़ता है। दो लाख वाहनों की हर दिन आवाजाही होती है। ब्रिज के नीचे 300 से ज्यादा दुकानें हैं। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और सियागंज, रानीपुरा जैसे व्यस्त इलाकों की कनेक्टिविटी भी इसी से है। जर्जर हालत, अतिक्रमण और कब्जों के कारण ब्रिज के आसपास का एरिया खास कर सियागंज महावीर चौक वाला हिस्सा ज्यादा खतरे में है। दोनों ओर ब्रिज का कुछ भाग पहले गिर भी चुका है। बारिश में पानी उतरने के कारण पूरे ब्रिज का स्ट्रक्चर प्रभावित हो रहा है। ब्रिज की इंजीनियरिंग भी ठीक नहीं है। पोल गिर रहे हैं। रैलिंग वाला भाग जर्जर हो रहा है। ब्रिज पर कारों की अवैध पार्किंग बन चुकी है। आसपास गंदगी और रात में अंधेरा भी रहता है। इसका निर्माण 1974 में लोक निर्माण विभाग ने शुरू किया था। शहरी हिस्से में होने से इसके रखरखाव की जिम्मेदारी नगर निगम को दी गई। पहले इसे सियागंज ब्रिज के नाम से जानते थे। बाद में इसका नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल ब्रिज किया गया। तब इसकी लागत करीब 3 करोड़ रुपए आई थी। 1978 में ब्रिज पर से ट्रैफिक की आवाजाही शुरू हुई। रैलिंग टूट रही, दोनों तरफ फुटपाथ की टाइल्स उखड़ी, ब्रिज ऊपर से दरक रहा पूर्व-पश्चिम को जोड़ता है
यहां से शहर के पश्चिमी हिस्से से पूर्वी हिस्से की ओर जाने वाला ट्रैफिक गुजरता है। यह लाइफ लाइन ब्रिज में से एक है। इससे छावनी, सियागंज सहित 20 से ज्यादा बाजार क्षेत्र का इलाका जुड़ा है। जूनी इंदौर से हाथीपाला होते हुए एबी रोड पर आवाजाही के लिए भी यह अहम कनेक्टिविटी है। राजबाड़ा क्षेत्र, गंगवाल बस स्टैंड को रेलवे स्टेशन, एमवाय, रेसीडेंसी, गीताभवन इलाके से भी सीधा जोड़ता है।
जल्द से जल्द सुधार जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है ब्रिज का रखरखाव कमजोर है। स्ट्रक्चर को बनाए अभी 50 साल भी नहीं हुए हैं। स्ट्रक्चर की जांच करवा कर सुधार कार्य करके इसकी उम्र बढ़ाई जा सकती है। वर्तमान इंजीनियरिंग में बहुत से विकल्प हैं, जिससे इसे मजबूत किया जा सकता है। अब भी लापरवाही की तो इसे तोड़कर बनाना ही विकल्प रहेगा। इससे जनता को बड़ी परेशानी होगी।


