छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से मासूमों की मौत के बाद खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने सिरप की जांच की और इसे बैन किया गया। लेकिन, यही गड़बड़ी इंजेक्शन या वैक्सीन में होती तो उसकी जांच तक नहीं हो पाती। वजह : प्रदेश में इंजेक्टेबल ड्रग टेस्टिंग की सुविधा ही नहीं है। मप्र में सिर्फ 3 ड्रग लैब (भोपाल, इंदौर, जबलपुर) हैं। इनकी कुल परीक्षण क्षमता ही लगभग 6,000 सैंपल प्रतिवर्ष है। यह भी अन्य दवाओं के लिए है। बता दें कि इंजेक्टेबल दवाओं की जांच गोलियों या सिरप की तुलना में जटिल है। इसमें बैक्टीरिया-फंगल संक्रमण, पायरोजेन, स्टरलिटी आदि विशेष परीक्षण शामिल हैं। मप्र में इन परीक्षणों की सुविधा, अनुभव व उपकरण नहीं हैं। इसका खामियाजा यह हो रहा है कि ये पता ही नहीं चल सकता कि कोई इंजेक्शन संक्रमण या बैक्टीरिया से दूषित तो नहीं। पूर्व ड्रग एनालिस्ट बताते हैं कि पहले यह टेस्ट खरगोशों पर किए जाते थे। भोपाल की लैब में 25 खरगोश थे। जिन पर दवा का डोज देकर तापमान में बढ़ोतरी से पायरोजेनिक रिएक्शन जांचा जाता था। करीब 15 साल पहले ये खरगोश मर गए तो नए खरगोश नहीं मंगाए। टेस्टिंग बंद हो गई। अब किसी भी इंजेक्टेबल दवा की जांच के लिए सैंपल को कोलकाता स्थित सेंट्रल ड्रग्स लैब में भेजना पड़ता है। रिपोर्ट आने में 2-3 माह लगते हैं। इस बीच दवा बिकती रहती है। महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, उप्र, दिल्ली, प. बंगाल, केरल में खुद की लैब उपलब्ध है। खतरा… इंजेक्शनों की रेंडम जांच होनी चाहिए, जो नहीं हो रही जांच क्यों जरूरी दो उदाहरण…सैंपल फेल, रिपोर्ट 3 माह बाद
1. जेंटामाइसिन इंजेक्शन (एंटीबायोटिक)की जांच के लिए सिवनी सीएमएचओ ने सैंपल मार्च 2024 में सेंट्रल ड्रग लैबोरेटरी (CDL), कोलकाता भेजा था। रिपोर्ट 30 मई 2024 को प्राप्त हुई। इस बीच कई लोगों के इलाज में इसका इस्तेमाल हो चुका था। इसे ब्लेकलिस्ट करने की कार्रवाई 25 जून 2024 को हुई।
2. Cefotaxime Sodium इंजेक्शन एक थर्ड-जनरेशन सेफालोस्पोरिन एंटीबायोटिक है। इंदौर में मार्च 2024 में साइड इफेक्ट आने पर सैंपल भेजा। रिपोर्ट 28 मई तक आई। 12 जुलाई 2024 को ब्लैक लिस्ट किया गया। अब प्रस्ताव मंजूर
राज्य सरकार ने केंद्र को लैब अपग्रेडेशन का जो प्रस्ताव भेजा था, वह मंजूर हो गया है। इसके तहत ग्वालियर में नई अत्याधुनिक ड्रग टेस्टिंग लैब बनाई जाएगी और भोपाल, इंदौर व जबलपुर की लैब्स को अपग्रेड किया जाएगा। हमने केंद्र को जो प्लान भेजा था, वह मंजूर हो गया है। 211 करोड़ रुपए खर्च कर इंजेक्टेबल ड्रग की जांच के लिए सुविधा शुरू की जाएगी। -दिनेश श्रीवास्तव, कंट्रोलर, खाद्य एवं औषधि प्रशासन


