छत्तीसगढ़ में सौ साल बाद जमीनों के सर्वेक्षण का काम हो रहा है। राज्य के करीब 20 हजार से अधिक राजस्व ग्रामों में आगामी मार्च तक सर्वे किया जाना है। माना जा रहा है कि इससे जमीन से जुड़े झगड़े कम होंगे और जमीन के रिकॉर्ड डिजिटल होंगे। लेकिन जैसे-जैसे जमीन के रिकॉर्डों का डिजिटलाइजेशन होता जा रहा है, वैसे-वैसे गड़बड़ियां भी सामने आ रही हैं। इसी का उदाहरएण है महासमुंद जिले का खैरा गांव। वहां खसरे संबंधी गड़बड़ी के 271 मामले उजागर हुए हैं। यहां पर कई खसरे खाते से गायब हैं, जबकि कई खसरों को घास भूमि दिखा दिया गया है। यहां तक कि कई खसरों पर दूसरे के नाम दर्ज हैं। दरअसल, महासमुंद तहसील के खैरा गांव के खसरे को डिजिटलाइज कर दिया गया है। बंदोबस्ती के समय खैरा गांव में 33% खसरे में गड़बड़ी मिली हैं। गड़बड़ी की शिकायत मिलने के बाद कलेक्टर ने इसमें सुधार के लिए फाइल मंत्रालय भेज दी है। मार्च तक पूरा नहीं होगा जियो रिफ्रेंसिंग का काम
जमीन सीमांकन के दौरान होने वाले विवादों के निपटारे के लिए छत्तीसगढ़ के सभी गांवों के कैडेस्ट्रल मैप का जियो रिफ्रेसिंग काम पिछले साल मार्च में शुरू हुआ था। मार्च 2025 तक प्रदेश के 33 जिलों के 20,222 गांवों में जियो रिफ्रेसिंग काम पूरा करने का लक्ष्य था। हालांकि, अब तक 19 जिलों के 10,243 गांवों का ही जियो रिफ्रेसिंग हुआ है। ऐसे में काम समय पर पूरा होने की उम्मीद कम है। ऐसी गड़बड़ी: किसान के खसरा नंबर पर अब घास भूमि खैरागांव के खिलावन चंद्राकर के दो खाते हैं। एक सेपरेट है जबकि दूसरा जॉइंट है। जॉइंट खाते में गड़बड़ी है। सेपरेट खसरे में भी गड़बड़ी थी, लेकिन इसमें सुधार हो गया है। जॉइंट खसरा खिलावन के पिता भारत चंद्राकर के नाम पर था। अब इस खसरे में भारत चंद्राकर के चार बेटे हिस्सेदार हैं। 503 नंबर का खसरा भारत के नाम पर है। पुराने रिकॉर्ड में इसका नंबर 109-3 दर्ज है। खिलावन का कहना है कि अब यह खसरा खाते से गायब है। पटवारी ने सर्वे के बाद नया नंबर दिया है। जब खसरा डिजिटलाइज हुआ तो पता चला कि इस खसरा नंबर को घास जमीन दिखाया गया है, जबकि जमीन पर अभी भी हमारा परिवार काबिज है। इसके अलावा राधेश्याम चंद्राकर, राम प्रसाद और अनिल आदि के साथ भी इसी तरह की समस्याएं हैं। लभरा के कुछ किसान भी खैरा में जमीन ली हैं। उनके भी खसरे में गड़बड़ी है। ये सभी लोग खसरे की गड़बड़ी को सुधरवाने के लिए लगातार पटवारी से लेकर कलेक्टर और मंत्रालय तक का चक्कर लगा रहे हैं। सभी ने सामूहिक रूप से इस गड़बड़ी को सुधारने के लिए मंत्रालय में आवेदन भी दिया है। पुराने और नए खसरे के रिकाॅर्ड में अंतर 60% तक बांगर गांव, तहसील कुरुद, जिला- धमतरी विशेषज्ञों का कहना है कि पुरानी पद्धति से बने खसरों और जीआईएस से बने नक्शों के बीच 62% तक का अंतर आ रहा है। इससे साफ है कि वर्तमान सर्वे और डिजीटलाइजेशन के बाद भी खसरा संबंधी लोगों की परेशानियां दूर होने वाली नहीं हैं। इस तरह की गड़बड़ी से बचने के लिए सैटेलाइट इमेज सिस्टम के जरिए रि-सर्वे करना होगा। डिजिटलाइजेशन गैरउपयोगी, रिसर्वे जरूरी: बेग राज्य में लैंड रिकॉर्ड के डिजिटलाइजेशन और खसरे की गड़बड़ी संबंधी शिकायतों के बाद अब पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। छत्तीसगढ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग के साइंटिस्ट मिर्जा कलीम बेग का कहना है कि राजस्व विभाग अभी सामान्य डिजिटलाइजेशन कर रहा है। यह अन्य किसी भी काम में उपयोगी नहीं है। अभी जो भी खसरे बने हैं वे मैन्युअल बने हैं। इनके मेजरमेंट नई तकनीक से मेल नहीं खाते हैं।
जमीन सीमांकन में होने वाले विवाद को दूर करने के लिए प्रदेश के सभी गांवों के कैडेस्ट्रल मैप का जियो रिफ्रेसिंग मार्च 2024 से हो रहा है। राजस्व अधिकारियों को जियो-रिफ्रेसिंग को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया गया है। इस तकनीक में लांगीट्यूड और लैटीट्यूड के माध्यम से वास्तविक भूमि का चिन्हांकन आसान हो जाएगा।
टंकराम वर्मा, राजस्व मंत्री


