राजस्थान में ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने की मांग को लेकर ग्रामीणों का संघर्ष जारी है। ओरण को देवी-देवताओं की भूमि माना जाता है। इसके संरक्षण की जिम्मेदारी ग्रामीण संभालते हैं। जैसलमेर में ग्रामीणों के अनुसार- ओरण का अस्तित्व दिनोंदिन सिमट रहा है। इसके लिए जिले के युवाओं ने खड़ताल और ढोलक की थाप पर लोक-देवताओं के भजनों के साथ पैदल यात्रा निकालने का फैसला किया है। मंडी में शामिल लोगों को ‘टीम ओरण’ का योद्धा कहा जा रहा हैं। शामिल सदस्य तनोट माता के मंदिर से जयपुर तक करीब 725 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकले हैं। यात्रा में 10 साल के बच्चे से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक शामिल है, जिन्हें डर है कि उनके पूर्वजों की विरासत ‘विकास’ के नाम पर कहीं खत्म न हो जाए। रोज करते हैं 30 किलोमीटर का सफर सूरज उगते ही जिले के लोगों का कारवां ‘जय तनोट राय’ के उद्घोष के साथ चलना शुरू कर देता है। रोजाना करीब 30 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। हालांकि यह सफर आसान नहीं है, लेकिन बर्फीली हवाएं और कई बार तेज धूप पड़ने के बावजूद इनका काफिला नहीं रुकता है। 21 जनवरी को तनोट माता मंदिर से शुरू हुआ काफिला 26 जनवरी को 150 किलोमीटर का सफर पूरा कर ‘भाग का गांव फांटा’ पहुंचा। गांव के लोगों को पता चला कि ओरण के लिए संघर्षरत काफिला उनके गांव पहुंचा है, तो ग्रामीणों ने खुद आगे बढ़कर सहयोग किया और भोजन-पानी की व्यवस्था भी की। ग्रामीणों का कहना है कि ओरण यहां केवल जमीन नहीं, पूजनीय भूमि है। पूर्व विधायक के बेटे भी हुए शामिल, बोले- हम रूकने वाले नहीं पूर्व विधायक रूपा राम धनदेव के बेटे हरीश भी यात्रा के शामिल सदस्यों के साथ चल रहे हैं। हरीश ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर JEN (कनिष्ठ अभियंता) की सरकारी नौकरी हासिल की। उनका कहना है- हम विकास के दुश्मन नहीं, लेकिन यह कैसा विकास है, जो हमारी आस्था के केंद्र ‘ओरण’ को ही निगल जाए? जब तक हमारी ओरण राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होगी, हम रुकने वाले नहीं हैं। वकील भी प्रदर्शन में साथ- साथ चल रहे दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ में पीएचडी कर रहे वकील धर्मवीर सिंह सांकड़ा का कहना है कि उनके पैरों में छाले हो सकते हैं, लेकिन इरादों में अभी मजबूती है। हमारे पूर्वजों ने इन जमीनों के लिए सिर कटाए हैं। मैं यहां एक वकील के साथ एक पर्यावरण प्रेमी के नाते भी हूं। हम कोर्ट में भी लड़ेंगे और सड़क पर भी। यात्रा के सूत्रधार सुमेर सिंह का कहना है कि यह पदयात्रा मजबूरी में उठाया गया कदम है। प्रशासन ने 3 महीने का समय मांगा था कि ओरणों को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर लेंगे। समय बीत गया, लेकिन फाइलें नहीं हिलीं। अब हम जयपुर जाकर सरकार की नींद उड़ाने का प्रयास करेंगे, जिससे ओरण को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। भजन कीर्तन पदयात्रियों का पावर बैंक यात्रा में शामिल सदस्य सामूहिक ठहरते है। दिनभर की थकान दूर करने के लिए सामूहिक भजन-कीर्तन करते हैं। उनका कहना है कि इससे वह रिचार्ज होते है और यहीं हमारा पावर बैंक है। यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं है। एक ही थाली में भोजन और एक ही जाजम पर बैठकर ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाना हमारा संकल्प है। ये लड़ाई अब केवल जमीन की नहीं, हमारी अस्मिता की बन चुकी हैं। यह है ओरण भूमि ओरण: वह भूमि जिसे किसी देवी-देवता के नाम पर संरक्षित रखा जाता है। यहां से लकड़ी काटना पाप माना जाता है। संकट: राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज न होने के कारण इन्हें ‘बंजर’ मान लिया जाता है और बड़ी सौर ऊर्जा कंपनियों को आवंटित कर दिया जाता है। असर: इससे मरुस्थल का इकोसिस्टम बिगड़ रहा है और पशुपालकों के सामने चारागाह का संकट खड़ा हो गया है। पढ़ें ओरण से जुड़ी ये खबर भी… उधर, डाली भी मत तोड़ना, पाप लगेगा-हाथ कट जाएंगे:बुजुर्ग कहते थे- ओरण देवताओं की भूमि; आंदोलनकारी बोले- भगवान की जमीन के लिए लड़ना पड़ रहा जैसलमेर में ओरण-गोचर भूमि के लिए प्रदर्शन कर रहे 34 साल के दुर्ग सिंह कहते हैं- आज हमें भगवान की जमीन के लिए लड़ना पड़ रहा है। (पढ़ें पूरी खबर) भाटी बोले-राजनीति होती रहेगी,100 बीघा जमीन है,कमा के खा-लूंगा:प्रतापपुरी ने कहा- मैं यहां माइक पकड़ने नहीं आया; ओरण बचाने के लिए जारी रहेगा धरना जैसलमेर में ओरण-गोचर बचाने को लेकर गड़ीसर से कलेक्ट्रेट तक विशाल जन आक्रोश रैली निकाली गई है। रैली कलेक्ट्रेट पर धरना स्थल पर पहुंचने के बाद जनसभा के रूप में तब्दील हो गई। (पढ़ें पूरी खबर)


