जालंधर के गोराया निवासी मनदीप सिंह का शव वतन लौटने के कई दिनों बाद आज अंतिम संस्कार कर दिया गया। पिछले कई दिनों से इंसाफ और सरकारी आर्थिक सहायता की मांग को लेकर परिवार ने शव को मुर्दाघर में रखा था। शासन-प्रशासन से कोई ठोस आश्वासन न मिलने के कारण आखिरकार परिजनों ने थक-हारकर भारी मन से मनदीप को अंतिम विदाई दी। मनदीप सिंह का शव उनके भाई जगदीप सिंह पिछले दिनों रूस से वापस गोराया लेकर आए थे। भाई की मौत और वहां के हालात देख चुके जगदीप और उनका पूरा परिवार गहरे सदमे में है। घर का चिराग बुझने के बाद परिवार पूरी तरह से टूट चुका है। इंसाफ के लिए मुर्दाघर में रखा रहा शव हैरानी की बात यह है कि शव भारत पहुंचने के बाद भी कई दिनों तक अंतिम संस्कार नहीं हो सका। परिजनों की मांग थी कि सरकार मनदीप की मौत के मामले में दखल दे और उन्हें इंसाफ दिलाए। साथ ही, आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार ने सरकार से मदद की गुहार भी लगाई थी। सुनवाई न होने की उम्मीद में परिवार ने शव को मुर्दाघर में ही रखवाया हुआ था। थक-हारकर दी अंतिम विदाई जब कई दिनों तक प्रशासन या सरकार की ओर से कोई मदद या ठोस आश्वासन नहीं मिला, तो परिवार ने थक-हारकर आज मनदीप का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। आज गोराया में गमगीन माहौल के बीच उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। परिजनों की खामोशी बयां कर रही थी दर्द अंतिम संस्कार के दौरान वहां मौजूद लोगों और मीडिया कर्मियों ने जब शोक संतप्त परिवार से बात करने की कोशिश की, तो कोई भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। परिवार के सदस्यों ने पूरी तरह चुप्पी साधे रखी, जो उनके गहरे दुख और सिस्टम के प्रति उनकी निराशा को साफ दर्शा रही थी। बता दें गोराया के रहने वाले 30 वर्षीय मनदीप कुमार अपने परिवार के बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में विदेश गए थे। परिजनों के अनुसार, मनदीप ट्रैवल एजेंटों के बिछाए जाल में फंस गए थे। एजेंटों ने उन्हें विदेश में अच्छी नौकरी दिलाने का झूठा भरोसा देकर रूस भेजा था, लेकिन वहां पहुँचने के बाद हकीकत पूरी तरह बदल गई। मनदीप के सफर की शुरुआत 17 सितंबर 2023 को हुई थी, जब वह अपने एक रिश्तेदार और तीन अन्य परिचितों के साथ अमृतसर एयरपोर्ट से फ्लाइट के जरिए आर्मेनिया के लिए रवाना हुए थे। वहां उन्होंने करीब तीन महीनों तक एक मजदूर के रूप में कड़ी मेहनत की। 9 दिसंबर 2023 को मनदीप अपने साथियों के साथ आर्मेनिया से रूस पहुंचे। हालांकि, कुछ समय बाद उनके रिश्तेदार और अन्य तीन साथी तो भारत वापस लौट आए, लेकिन मनदीप बेहतर अवसरों की उम्मीद में रूस में ही रुक गए। यही फैसला उनके जीवन का आखिरी मोड़ साबित हुआ।


