मणिपुर में कुकी समुदाय जानवरों की आवाज निकालकर डरा रहा:हिंसा के ढाई साल बाद भी दहशत; उग्रवादियों ने घरों और फार्महाउस में आग लगाई

मणिपुर की राजधानी इम्फाल वेस्ट से 25 किलोमीटर दूर आखिरी गांव कौत्रुक चिंग लेइकाई में लोग हिंसा के ढाई साल बाद भी लोग दहशत में हैं। यहां के लोगों का आरोप की कुकी समुदाय के लोग उन्हें उकसाने के लिए रात में जानवरों की आवाज निकलते हैं। उनका कहना है कि कुक चाहते हैं कि गांव वाले इसका जवाब दें जिससे कुकी उनपर हमला कर सकें। वहीं, मणिपुर के कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में सोमवार को उग्रवादियों ने कई घरों और फार्महाउसों में आग लगा दी। के सोंग्लुंग गांव में हुई घटना की जिम्मेदारी जेलियांग्रोंग यूनाइटेड फ्रंट ने ली। फ्रंट ने आरोप लगाया है कि इन घरों, फार्महाउसों में अफीम की अवैध खेती की जा रही थी। कुकी संगठन ने नेशनल हाईवे बंद करने की चेतावनी दी इस घटना के बाद कुकी नागरिक समाज संगठन, कमेटी ऑन ट्राइबल यूनिटी ने चेतावनी दी है कि आरोपी गिरफ्तार नहीं हुए तो 27 जनवरी की रात से 28 जनवरी की रात तक इम्फाल-दीमापुर नेशनल हाईवे बंद कर देंगे। 2023 हिंसा की पीड़ित बोली- बम नहीं गिर रहे, पर स्थि​ति सामान्य नहीं 8 सितंबर 2023 को गांव की निंगथॉजाम जिना (17) घायल हो गई थी। वे कहती हैं, तब कक्षा 9 में थी। एक गोली दाहिने पैर को छूते हुए निकल गई। उन्होंने बताया कि वह तब इतनी डर गई थी कि परीक्षा नहीं दी। जिना ने कहा कि अब भी स्थिति सामान्य नहीं हुई है। जिना की बड़ी बहन नौबी ने कहा कि अभी गोली नहीं चल रही है, बम नहीं गिर रहे हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि शांति कायम हो गई है। हम अब भी डर के साये में जीते हैं। मणिपुर में एक साल से राष्ट्रपति शासन लगा मणिपुर में मई 2023 में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी। यह 2025 के शुरुआती महीनों तक जारी रही। हिंसा के दौरान कई इलाकों में आगजनी, लूट और हत्याओं की घटनाएं हुईं। हजारों लोग विस्थापित हुए और राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए। मणिपुर के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने 9 फरवरी, 2025 को इस्तीफा दे दिया था। दो साल से ज्यादा समय तक जारी हिंसा न रोक पाने के कारण उनपर लगातार राजनीतिक दबाव बन रहा था। बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद 13 फरवरी को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इसे फरवरी, 2026 तक बढ़ा दिया गया है। 4 पॉइंट्स में समझिए मणिपुर हिंसा की वजह… मणिपुर की आबादी करीब 38 लाख है। यहां तीन प्रमुख समुदाय हैं- मैतेई, नगा और कुकी। मैतई ज्यादातर हिंदू हैं। नगा-कुकी ईसाई धर्म को मानते हैं। ST वर्ग में आते हैं। इनकी आबादी करीब 50% है। राज्य के करीब 10% इलाके में फैली इंफाल घाटी मैतेई समुदाय बहुल ही है। नगा-कुकी की आबादी करीब 34 प्रतिशत है। ये लोग राज्य के करीब 90% इलाके में रहते हैं। कैसे शुरू हुआ विवाद: मैतेई समुदाय की मांग है कि उन्हें भी जनजाति का दर्जा दिया जाए। समुदाय ने इसके लिए मणिपुर हाईकोर्ट में याचिका लगाई। समुदाय की दलील थी कि 1949 में मणिपुर का भारत में विलय हुआ था। उससे पहले उन्हें जनजाति का ही दर्जा मिला हुआ था। इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सिफारिश की कि मैतेई को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल किया जाए। मैतेई का तर्क क्या है: मैतेई जनजाति वाले मानते हैं कि सालों पहले उनके राजाओं ने म्यांमार से कुकी काे युद्ध लड़ने के लिए बुलाया था। उसके बाद ये स्थायी निवासी हो गए। इन लोगों ने रोजगार के लिए जंगल काटे और अफीम की खेती करने लगे। इससे मणिपुर ड्रग तस्करी का ट्राएंगल बन गया है। यह सब खुलेआम हो रहा है। इन्होंने नागा लोगों से लड़ने के लिए आर्म्स ग्रुप बनाया। नगा-कुकी विरोध में क्यों हैं: बाकी दोनों जनजाति मैतेई समुदाय को आरक्षण देने के विरोध में हैं। इनका कहना है कि राज्य की 60 में से 40 विधानसभा सीट पहले से मैतेई बहुल इंफाल घाटी में हैं। ऐसे में ST वर्ग में मैतेई को आरक्षण मिलने से उनके अधिकारों का बंटवारा होगा। सियासी समीकरण क्या हैं: मणिपुर के 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई और 20 विधायक नगा-कुकी जनजाति से हैं। अब तक 12 CM में से दो ही जनजाति से रहे हैं।

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