राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान पारित हुए 9 विधेयकों (बिल) को अलग-अलग कारणों से विधानसभा को लौटा दिया। राज्यपाल ने इन बिलों के कानूनी पहलुओं पर सवाल उठाते हुए वापस भेजा है। ये बिल वर्ष 2019 से लेकर 2023 में पारित करवाए गए थे। वहीं वसुंधरा राजे के पहले कार्यकाल के दौरान वर्ष 2008 में पारित एक बिल भी लौटाया है। गहलोत सरकार के दौरान वर्ष 2019 में ऑनर किलिंग और मॉब लिंचिंग के खिलाफ पारित दोनों बिलों को फिर से विचार करने के लिए लौटाया है। ऑनर किलिंग पर उम्र कैद और पांच लाख जुर्माने का प्रावधान था। मॉब लिंचिंग पर भी कड़ी सजा का प्रावधान किया गया था। इन दोनों बिलों के कई प्रावधान पहले आईपीसी में थे। राज्यपाल ने इनके प्रावधान केंद्रीय कानूनों से टकराने के कारण वापस लौटाए हैं। वहीं वसुंधरा राजे सरकार में पारित राजस्थान धर्म स्वातंत्र्य विधेयक-2008 को सरकार पहले ही वापस लेने का फैसला कर चुकी है। इसकी जगह धर्मांतरण विरोधी कानून पहले ही लाया जा चुका है। इसके अलावा दो प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बिल के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए लौटाया है। तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के जवाब में गहलोत सरकार लाई थी बिल
केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस ने देशभर में अभियान चलाया था। उस समय गहलोत सरकार ने केंद्रीय कृषि कानूनों की काट के तौर पर 2 नवंबर 2020 को कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) (राजस्थान संशोधन) विधेयक-2020 और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार (राजस्थान संशोधन) विधेयक पारित किए थे। 2 नवंबर 2020 को दोनों बिल पारित हुए थे। बाद में केंद्र सरकार ने कृषि कानून वापस ले लिए थे। केंद्रीय कानून के जवाब में राज्य के कानूनों की वैधानिकता पर उस समय भी सवाल उठे थे। केंद्र के कानून वापस लेने के बाद इन दोनों बिल का कोई औचित्य नहीं रह गया था। राज्यपाल ने दोनों बिल के कानूनी आधार और औचित्य नहीं होने का तर्क देते हुए वापस भेजा है। 2 प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बिलों पर भी उठाए सवाल
राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने दो प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बिल के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए वापस लौटाया है। व्यास विद्यापीठ विश्वविद्यालय जोधपुर विधेयक-2022 और सौरभ विश्वविद्यालय हिन्डौन सिटी (करौली) विधेयक-2022 को वापस भेजा है। गहलोत राज में पारित इन 9 विधेयकों को वापस लौटाया बिल लौटाने के पीछे कानूनी आधार, राज्यपाल पहले भी लौटाते रहे हैं बिल
राज्यपाल पहले भी बिल लौटाते रहे हैं। अगर राज्य के किसी बिल के प्रावधान केंद्रीय कानूनों के प्रावधानों से टकराते हैं तो राज्यपाल इन्हें वापस भेज देते हैं। केंद्र और राज्य के बीच कानून बनाने को लेकर साफ प्रावधान है। राज्य केवल राज्य सूची के विषयों पर ही कानून बना सकते हैं। समवर्ती सूची में केंद्र औ राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन यहां भी केंद्रीय कानून ही मान्य होंगे। राज्य का कोई कानून केंद्रीय प्रावधानों को नहीं पलट सकता। वसुंधरा राजे सरकार के समय पारित धर्म स्वातंत्रय विधेयक को तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने वापस लौटा दिया था। इसके बाद यह बिल केंद्र सरकार में अटक गया था। राज्यपाल की मंजूरी के बाद ही विधेयक बनता है कानून
विधानसभा से पारित कोई भी बिल राज्यपाल से मंजूरी मिलने के बाद ही कानून बनता है। राज्यपाल कानूनी, संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देकर बिल वापस लौटा सकते हैं। राज्यपाल को बिल विधानसभा से मंजूरी के लिए भेजे जाते हैं, इसलिए लौटाया भी विधानसभा को जाता है। राज्यपाल के बिल रोकने की समय सीमा नहीं है। इसे लेकर कई बार कानूनी बहस भी छिड़ती रही है। बिल के प्रावधानों पर विधानसभा के जरिए सरकार से राज्यपाल स्पष्टीकरण मांग सकते हैं।


