3 बार असफल हुआ, लास्ट चांस में बना लेफ्टिनेंट:पिता के ड्राइक्लीन की दुकान, एक बार तो इंटरव्यू के लिए मां को सोने की अंगूठी बेचनी पड़ी

कोटा का राहुल वर्मा कड़ी मेहनत के बाद आर्मी लेफ्टिनेंट बनकर घर लौटा है। राहुल के कोटा पहुंचने पर परिवार वालों व रिश्तेदारों ने ढोल नगाड़ों से जोरदार स्वागत किया। उसे रेलवे स्टेशन से ओपन कार में सवार बैठाकर घर लाए। गली में पहुंचने पर लोगों ने राहुल को कंधे पर उठा लिया और मकान तक छोड़ा। राहुल की सफलता के पीछे संघर्ष की कहानी छिपी हुई है। राहुल के पिता नंदकिशोर स्टेशन इलाके में दो कमरों के मकान में रहते है। एक कमरे में प्रेस की दुकान है। दूसरे कमरे में पूरा परिवार रहता है। परिवार एक बेटी व एक बेटा राहुल है। बड़ी बेटी प्राइवेट स्कूल में टीचर है। एयरफोर्स में सिलेक्शन हुआ,जॉइन नही किया
लेफ्टिनेंट राहुल ने बताया कि जिस इलाके वो रहते है। वहां अक्सर आर्मी के जवानों को देखा करते थे। उनका सपना था कि वो भी आर्मी में जाकर देश की सेवा करें। इसके लिए तीन बार एनडीए का एग्जाम दिया। लेकिन सफलता नहीं मिली। इस बीच साल 2019 में एयरफोर्स में भी सिलेक्शन हुआ। वहां पर पोस्ट छोटी मिली। इसलिए जॉइन नही किया। बिना कोचिंग के सफलता हासिल की
राहुल ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति सही नही थी। इसलिए यूट्यूब ओर सोशल मीडिया के जरिए पढ़ाई की। साल 2020 में फिर से एनडीए का एग्जाम दिया।आखिरी चांस में सिलेक्शन हो गया। 95 रेंक हासिल की। 4 साल की पुणे और देहरादून में ट्रेनिंग के बाद आर्मी ऑफिसर बनने का सपना पूरा हो गया। पूरे बेच में हिंदी मीडियम से पढ़ा इकलौता था।बाकी सभी इंग्लिश मीडियम से पढ़े लिखे थे। राजस्थान से एकमात्र मेरा सिलेक्शन हुआ। राहुल ने बताया कि उनके परिवार में कोई भी सरकारी नौकरी में नहीं था। बहन शिवानी प्राइवेट स्कूल में जॉब करती हैं। उसने मुझे हमेशा मोटिवेट भी किया। आर्थिक मदद में भी उसने कोई कमी नहीं छोड़ी। राहुल ने स्टेशन क्षेत्र के ही प्राइवेट हिंदी मीडियम स्कूल से 12वीं तक पढ़ाई की थी। एनडीए में सिलेक्शन के बाद इंटरव्यू के दौरान इंग्लिश कमजोर होने की समस्या भी सामने आई। कड़ी मेहनत करके इंटरव्यू को भी फाइट किया। इंडियन मिलिट्री अकादमी के पासिंग आउट परेड का हिस्सा बना जो जिंदगी का सबसे बेहतरीन पल था। मां ने अंगूठी बेच फ्लाइट से भेजा
पिता नंद किशोर ने बताया कि शुरू से ही आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। राहुल का 2020 में सेंटर बेंगलुरु आया। उस समय कोविड का दौर चल रहा था। तब राहुल की मां ने अपनी सोने की अंगूठी को बेचकर फ्लाइट से बेंगलुरु भेजा। लेकिन उस समय भी सिलेक्शन नहीं हुआ। राहुल ने हार नहीं मानी ओर नतीजा आज लेफ्टिनेंट बनकर ही माना। इस पूरे सफर में समाज के लोगों ने भी आर्थिक मदद दी। आज समाज के लिए राहुल प्रेरणा बन रहा है। बेटा देश सेवा में परिवार का नाम रोशन करेगा। जिंदगी में इससे बड़ी खुशी एक पिता के लिए क्या हो सकती है।

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