साल 2016 में शुरु हुई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से गरीबों को गैस कनेक्शन देने की शुरुआत हुई। एमपी में इस योजना का हाल कुछ ऐसा है कि हर साल 16 लाख से ज्यादा उपभोक्ता एक सिलेंडर भी नहीं भरवा पाते।
भाजपा सरकार के मंत्री और नेता अक्सर मंच पर इस योजना का जोर-शोर से बखान करते हैं लेकिन, आज भी इस योजना की जमीनी हकीकत कुछ और है। समाज के अंतिम छोर के लोग यानी आदिवासी वर्ग के पास गैस के कनेक्शन नहीं हैं। हालत ऐसी है जैसे- दीया तले अंधेरा। भास्कर रिपोर्टर की आंखों देखी पढ़िए… भोपाल के अरेरा हिल्स पर पुरानी जेल के ठीक सामने की सड़क पर लड़खड़ाते कदमों से सिर पर लकड़ियों का गठ्ठर लिए एक बच्ची नंगे पैर आती दिखी। उस बच्ची के पीछे उसके परिवार और मुहल्ले की कुछ महिलाएं और बच्चे-बच्चियां भी सिर पर लकड़ी का गट्ठा बांधे आती दिखीं। आंगनवाड़ी और स्कूल जाने वाली उम्र में बच्ची को लकड़ियों का बोझा लाते देख उसका हालचाल पूछा। तो बच्ची ने लड़खड़ाती जुबां में बताया कि वो जंगल से लकड़ियां बीनकर लाती है और इन लकड़ियों से घर में चूल्हा जलता है। इतने में बच्ची के पीछे उसके परिवारजन भी सिर पर लकड़ी रखे हुए आ गए और बच्ची अपने घर की तरफ चली गई। उसके परिजनों से पता पूछा तो उन्होंने बताया कि वे वल्लभ भवन यानी मंत्रालय के सामने वल्लभ नगर झुग्गी बस्ती में रहते हैं।
राजधानी में मंत्रालय के सामने छोटी सी बच्ची को परिवार के साथ जंगल से आखिर लकड़ी क्यों लानी पड़ रही है। परिवार द्वारा बताए पते पर खोजते हुए मंत्रालय के सामने झुग्गी बस्ती में पहुंचे। खोजबीन के दौरान उसी बच्ची के साथ वाला एक लड़का मिला जो हमें उन परिवारों तक लेकर गया। झुग्गी भी तंग गली में जहां दो लोग न गुजर सकें
वल्लभ नगर के अंत में मंदिर के सामने एक बेहद संकरी गली में हम उस बच्ची के घर पहुंच गए। गली इतनी संकरी थी कि दो लोग एक साथ नहीं गुजर सकते। झुग्गी के बाहर लकड़ियों के गट्ठे का ढे़र लगा हुआ था। दर्जन भर आदिवासी परिवार, गैस कनेक्शन नहीं
वल्लभ नगर झुग्गी बस्ती में रहने वाली 6 साल की दीपिका भाबोर के पिता सुरेश भाबोर ने बताया यहां 10-15 आदिवासी परिवार रहते हैं। किसी के पास गैस कनेक्शन नहीं हैं। हमें कोई योजना का लाभ नहीं मिला। चार से पांच किलोमीटर दूर हम लोग, महिलाएं बच्चे लकड़ी लेने जाते हैं फिर चूल्हा जलाते हैं। सुरेश कहते हैं कि घर की स्थिति खराब है इस कारण से बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। नौवीं के बाद आदिवासी बालिका ने छोड़ा स्कूल
शिवानी भाबर ने बताया- हमें चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी लेने के लिए चार-पांच किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। मैं पहले स्कूल जाती थी अब छोड़ दिया। मैंने नौंवी तक पढ़ाई की है। हमारे माता-पिता मजदूरी करते हैं। हम भी मजदूरी करने जाते हैं। शिवानी से पूछा कि क्या सरकार की तरफ से कभी कोई गैस कनेक्शन दिलाने के लिए आया या नहीं? तो शिवानी ने कहा अब तक कोई पूछने नहीं आया।
उज्ज्वला योजना की स्थिति भी जान लीजिए
एमपी में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत मध्य प्रदेश में 88 लाख 46 हजार कनेक्शन हैं। लेकिन, भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आंकडे़ बताते हैं कि मध्य प्रदेश में हर साल 16 लाख से ज्यादा उज्जवला योजना के उपभोक्ता ऐसे हैं जो पूरे साल में एक सिलेंडर भी नहीं भरवा पाते। 16 लाख उपभोक्ता ऐसे हैं जो साल भर में गैस सिलेंडर की सिर्फ एक रिफिल लेते हैं। कांग्रेस ने कहा: उज्ज्वला की हकीकत मंत्रालय के सामने ही पता चल रही
कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने कहा- भाजपा की मप्र और केन्द्र की मोदी सरकार लगातार उज्ज्वला योजना का बखान करती है, लेकिन आंकडे़ बताते हैं कि 15 लाख से ज्यादा ऐसे परिवार हैं जो एक सिलेंडर भी नहीं भरवा पा रहे। ये बडे़ शर्म की बात है। वल्लभ भवन के अधिकारियों को तो वल्लभ भवन की छठवीं मंजिल से कूद जाना चाहिए। क्योंकि इस तरह की स्थिति जब मंत्रालय के सामने है कि 6-7 साल की छोटी-छोटी बच्चियां अपने सिर पर लकडियों का गट्ठा लेकर निकल रहीं हैं। तो ये उज्जवला योजना की हकीकत को बयां करता है। दलितों आदिवासियों को कहीं किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। बल्कि उनका शोषण जरूर हो रहा है। ये खबर भी पढ़ें… ढाई साल में 5.70 लाख घटी लाड़ली बहनों की संख्या मध्यप्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना में ढाई साल के अंतराल में 5 लाख 70 हजार से अधिक महिलाओं के नाम बाहर हो गए हैं। अब इस योजना में पात्र महिलाओं की संख्या 1 करोड़ 25 लाख 31 हजार ही रह गई है। एक साल के अंतराल में इस योजना में एक लाख से अधिक नाम कम हो गए हैं।पूरी खबर पढ़ें


