हनुमानगढ़ में सर्व ब्राह्मण महासभा ने प्रस्तावित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों का विरोध किया है। महासभा ने इन नियमों को उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए हानिकारक बताते हुए राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन जिला कलेक्टर के माध्यम से सौंपा। ज्ञापन में इन नियमों पर पुनर्विचार की मांग की गई है। महासभा के जिलाध्यक्ष दुर्गाप्रसाद शर्मा ने बताया कि यूजीसी के प्रस्तावित नियमों में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे विश्वविद्यालयों में जातिगत विभाजन बढ़ सकता है। उनका कहना है कि इससे निष्पक्ष और भयमुक्त शैक्षणिक वातावरण बाधित होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि ये नियम संविधान में निहित समानता और न्याय की भावना के अनुरूप नहीं हैं। नियमों पर पुनर्विचार की जरूरत बताई
महासभा ने तर्क दिया कि देश में पहले से ही भारतीय न्याय संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, एंटी-रैगिंग नियम और अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कड़े कानून लागू हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए अलग से जातिगत नियम लाने की आवश्यकता पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाना चाहिए। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि कोई छात्र वास्तव में जातिगत भेदभाव करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि, झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों के मामलों में आरोप लगाने वालों के लिए भी स्पष्ट दंड का प्रावधान आवश्यक है। महासभा का मानना है कि नए नियमों में ऐसी व्यवस्था न होने से शिक्षण संस्थानों में भय और असुरक्षा का माहौल बन सकता है। न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है नए नियम
महासभा ने बताया कि वर्ष 2012 से पहले लागू नियमों में झूठे आरोप सिद्ध होने पर दंड या जुर्माने का प्रावधान था। वर्तमान प्रस्तावित नियमों में इस प्रावधान का अभाव गंभीर चिंता का विषय है। इससे सामान्य वर्ग को पहले से दोषी मानने जैसी धारणा बन सकती है, जो न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इस अवसर पर संरक्षक नरेंद्र सारस्वत, वरिष्ठ उपाध्यक्ष आशीष पारीक, संगठन महासचिव चंद्रभान तिवाड़ी, पूर्व पार्षद महेश शर्मा, एडवोकेट मनोज शर्मा और वरिष्ठ एडवोकेट जितेंद्र सारस्वत सहित समाज के कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। महासभा ने राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप कर प्रस्तावित नियमों में आवश्यक संशोधन कराने की मांग की है।


