माघ मेले में किन्नर योनि की पूजा क्यों कर रहे?:अघोरी किन्नर बोले- मां कामाख्या से कनेक्शन; महामंडलेश्वर ने बताया रहस्य

महाकुंभ हो या अब प्रयागराज का माघ मेला, सबसे ज्यादा भीड़ किन्नर अखाड़ा में दिखती है। इस बार किन्नर अखाड़े को तीन जगहों पर कैंप मिला। तीनों में एक बड़ी समानता है। तीनों ही जगहों पर योनि (महिलाओं का प्राइवेट पार्ट) के आकार का हवन कुंड बनाया गया है। कुंड हमेशा प्रज्जवलित रहता है। श्रद्धालु आते हैं और हाथ जोड़कर नमन करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। हर व्यक्ति के दिमाग में यह बात आती है कि आखिर किन्नर योनि की पूजा क्यों करते हैं? दैनिक भास्कर की टीम भी किन्नर अखाड़े में गई और इसके बारे में अखाड़े के ही महामंडलेश्वर और श्री महंतों से बात की। जो कुछ निकलकर सामने आया आइए वह जानते हैं… महाकुंभ में एक, माघ मेले में पहली बार तीन कैंप
प्रयागराज माघ मेले में यह पहला मौका है, जब किन्नर अखाड़े को तीन जगहों पर कैंप दिया गया है। इसमें एक पुराना अखाड़ा है, जिसकी प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी हैं। महाकुंभ-2025 में इन्हीं का एक कैंप था। दूसरा कैंप सनातनी किन्नर अखाड़े के रूप में है। इसकी महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरि हैं। तीसरी जगह महामंडलेश्वर कल्याणी मां को मिली है। वह लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के अखाड़े से जुड़ी हैं। इन सभी जगहों पर पूजा के लिए जो कुंड बना था, वह योनि के आकार का था। ‘दैनिक भास्कर’ ऐप टीम शाम के वक्त सेक्टर-6 स्थित सनातनी किन्नर अखाड़े में पहुंची। यहां हमारी मुलाकात सबसे पहले महामंडलेश्वर संजना नंद गिरी से हुई। संजना अखाड़े में आ रहे भक्तों को आशीर्वाद दे रही थीं। हमने बातचीत के बाद सवाल पूछा कि आखिर किन्नर योनि की पूजा क्यों करते हैं? संजना कहती हैं, हमारी कुल देवी बहुचरा मां हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा नहीं कि हमारी पद्धति अलग है, हम सांसारिक पूजा भी करते हैं। इसलिए सिर्फ यह कहना कि हम सिर्फ यही पूजा करते हैं, वह ठीक नहीं। हालांकि इस दौरान कुंड के पास कुछ लोगों को बैठाकर पूजा करवाई जा रही थी। लेकिन यहां वीडियो बनाने की इजाजत नहीं थी, इसलिए हमने इसे कैमरे में कैद नहीं किया। यह एक तंत्र साधना है
इसके बाद हमने इस विषय पर सनातनी किन्नर अखाड़े की प्रमुख महामंडलेश्वर कौशल्या नंद गिरी से बात की। वह कहती हैं, योनि पूजा का मुख्य कारण यह है कि हम सभी का जन्म योनि से ही हुआ है। इसलिए इसका विशेष महत्व है। कौशल्या नंद गिरी आगे कहती हैं, हमारी 10 विद्याओं में एक तांत्रिक विद्या है। यह कुल मिलाकर तंत्र साधना से जुड़ी होती है। किन्नर समाज में भी जो तंत्र साधना करते हैं, वह शाम को पूजा पर बैठ जाते हैं। कुछ लोग तो रात में भी बैठे रहते हैं। इस वक्त गुप्त नवरात्रि चल रही है, इसलिए यह पूजा ज्यादा होती है। फिलहाल हम तंत्र साधना नहीं करते। हवन कुंड में सिर्फ अनाज की आहुति
दो किन्नर महामंडलेश्वरों से बात करने के बाद हम हवन कुंड के पास पहुंचे। वहां एक किन्नर अघोरी बैठकर पूजा कर रहे थे। उनके आसपास कुछ महिलाएं बैठी थीं। अघोरी के साइड में नीता नंदगिरी किन्नर बैठी थीं। वह कहती हैं, आप इस हवन कुंड और पूजा का सीधा सा मतलब समझिए। हमारे जो जजमान होते हैं, हम उनके लिए यहां बैठकर हवन पूजन करते हैं और फिर मनोकामना मांगते हैं कि वह जो भी चाहते हैं, पूरा किया जाए। बहुत सारे लोग ऐसे आते हैं, जिनके बच्चे नहीं होते। यहां हम गोद भरवाते हैं, माता रानी उनकी मनोकामना पूरी करती हैं। जिसे भी पूजा में शामिल होना होता है, वह आकर बैठ जाए। इसके बाद हमने अघोरी किन्नर से बातचीत शुरू की। वह कहते हैं, हम जहां भी पूजा करते हैं वह योनि के स्वरूप में ही बनाया जाता है। यह माता कामाख्या के देवी के चलते किया जाता है। उनका ही यह एक स्वरूप है। 10 महा विद्या के अलावा जो 51 शक्तिपीठ हैं, उसमें एक पीठ कामाख्या है, हम इसी की पूजा करते हैं। अघोरी किन्नर ने बताया- हमने हवन कुंड को तीन कोण में बनाया है। एक कोण पर महा कालका, दूसरे कोण पर महासरस्वती और तीसरे कोण पर महालक्ष्मी विराजमान हैं। महाकाल, ब्रह्मा और विष्णु भी हैं। सभी चीजों को देखकर ही यह बनाया जाता है। अघोरी किन्नर कहते हैं, आप एक बार हवन कुंड में देखिए। हम इसमें जो आहुति डलवाते हैं, वह सिर्फ अनाज होता है। इसमें मटर, चना, गेहूं, काला उड़द, हरी उड़द की दाल होती है। हम इसलिए करते हैं, क्योंकि अनाज से शुद्ध कुछ भी नहीं होता। इसके बाद हम तंत्र ज्ञान हासिल करते हैं। तंत्र ज्ञान के लिए हम कई बार रात-रात भर इसी हवन कुंड के पास बैठकर पूजा करते हैं। अब बात किन्नरों की कुलदेवी और कुलदेवता की…
किन्नर समाज बहुचरा देवी को अपनी कुलदेवी मानते हैं। बहुचरा देवी को मुर्गे वाली मां के नाम से भी जाना जाता है। इनका सबसे प्रसिद्ध मंदिर गुजरात के मेहसाणा में है। इसे वडोदरा के राजा मानाजी राव गायकवाड़ ने बनवाया था। यहां बहुचरा देवी मुर्गे पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें मुर्गे वाली देवी भी कहा जाता है। किन्नर समाज बहुचरा देवी को अर्धनारीश्वर के रूप में पूजा करता है। किन्नरों की पूजा की कथा महाभारत से भी संबंधित है। उस वक्त अर्जुन और नागकन्या उलूपी ने एक पुत्र को जन्म दिया था, जिसका नाम इरावण रखा गया। महाभारत के युद्ध के वक्त पांडवों को अपनी जीत के लिए मां काली के सामने स्वेच्छा से एक पुरुष का बलिदान करने की जरूरत पड़ी। उस वक्त कोई राजकुमार आगे नहीं आया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अपने बेटे इरावण को युद्ध क्षेत्र में लाने को कहा। इरावण बलिदान के लिए सहमत तो हो गया, लेकिन शर्त रखी कि वह विवाहित होकर ही मरेगा। यहां यह संकट हुआ कि अब कौन शादी करे। क्योंकि एक दिन में ही जो शादी करेगी, वह विधवा हो जाएगी। उस वक्त भगवान श्रीकृष्ण को याद आया कि उन्हें भगवान शिव ने पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दिया था। तब भगवान कृष्ण स्वयं पृथ्वी पर नपुंसक के रूप में जन्म लेते हैं और फिर इरावण से शादी करते हैं। एक दिन बाद इरावण ने अपने हाथों से अपना सिर मां काली के चरणों में अर्पित कर दिया। इसके बाद किन्नर समाज इरावण की पूजा करने लगा। जब भी कोई नया किन्नर ग्रुप में शामिल होता है, उसकी शादी संकेतिक रूप से इरावण से की जाती है। इरावण किन्नर समाज के कुलदेवता हैं। ……………… ये खबर भी पढ़ें… अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेला छोड़कर गए:कहा- बिना स्नान दुखी मन से लौट रहा हूं, इसकी कल्पना नहीं की थी शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने ​​​​​​प्रयागराज माघ मेला छोड़ दिया है। वह काशी के लिए रवाना हो गए हैं। इससे पहले, उन्होंने बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा- आज मन इतना व्यथित है कि हम बिना स्नान किए ही विदा ले रहे हैं। इस दुख की भरपाई पता नहीं कौन सा नेता आएगा कौन सी पार्टी आएगी जो करेगी। प्रयागराज हमेशा से आस्था और शांति की धरती रही है। श्रद्धा के साथ यहां आया था, लेकिन एक ऐसी घटना हो गई, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी। पढ़िए पूरी खबर…

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