कभी बुजुर्गों तक सीमित मानी जाने वाली हृदय रोगों की समस्या अब बच्चों में भी तेजी से बढ़ रही है। आरएनटी मेडिकल कॉलेज के हार्ट हॉस्पिटल की वर्ष 2025 की रिपोर्ट चिंताजनक है। सबसे चौंकाने वाले आंकड़े 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से जुड़े हैं। वर्ष के शुरुआती 11 महीनों में ही 66 बच्चों को हृदय रोग व दिल की गंभीर बीमारियों के चलते अस्पताल में भर्ती कर उपचार देना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई में सभी आयु वर्गों में दिल के मरीजों की संख्या सबसे अधिक रही। इस दौरान कार्डियोलॉजी विभाग में अकेले एक महीने में 495 मरीज भर्ती हुए। हार्ट हॉस्पिटल के सीनियर प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. मुकेश शर्मा ने बताया कि बच्चों में हार्ट वाल्व की खराबी (रुमेटिक हार्ट डिजीज), हृदय के ऊपर पानी जमा होना, हृदय की ताकत कमजोर होना (कार्डियोमायोपैथी) और दिल में छेद जैसी जन्मजात बीमारियों के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि यदि माता-पिता में से किसी एक को दिल में छेद की समस्या हो या बच्चा सिंड्रोमिक हो तो यह बीमारी बच्चों में भी पाई जाती है। कई मामलों में यह अनुवांशिक भी होती है। डॉ. शर्मा ने बच्चों के खान-पान और दिनचर्या पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताते हुए कहा कि संतुलित आहार से संक्रमण को रोका जा सकता है। बच्चों की दिनचर्या आउटडोर खेलों और स्वास्थ्यवर्द्धक गतिविधियों से जुड़ी होनी चाहिए। शहरी जीवनशैली में ज्यादा खतरा : शहर में युवा घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं। पैदल चलना और शारीरिक मेहनत कम होती जा रही है। लिफ्ट, वाहन और स्क्रीन-आधारित जीवन आम है। इससे मोटापा, हाई बीपी और शुगर बढ़ते हैं, जो दिल के सबसे बड़े दुश्मन हैं। 32 बच्चों को सर्जरी व जटिल उपचार की जरूरत पड़ी युवाओं का दिल भी खतरे में : 2,486 मामले रिपोर्ट केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। 19 से 59 वर्ष के वर्किंग क्लास युवाओं और प्रौढ़ों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। इस आयु वर्ग में कार्डियोलॉजी विभाग में 2,144 और थोरेसिक विभाग में कुल 342 मरीज भर्ती हुए। यानी कुल 2,486 युवाओं को दिल की बीमारियों के कारण अस्पताल पहुंचना पड़ा। यह आंकड़े इस आयु वर्ग में बढ़ते तनाव और बदलती जीवनशैली की ओर साफ संकेत करता है। वहीं, 60 से 91 वर्ष के आयु वर्ग में एक साल में 2,459 मरीज भर्ती हुए। जनवरी 2025 से नवंबर 2025 के बीच हार्ट हॉस्पिटल में कुल 5,177 मरीजों को भर्ती कर उपचार दिया गया। समय पर जांच से बच सकता है बच्चों का भविष्य शिशु रोग विशेषज्ञ एवं एमबी अस्पताल के अधीक्षक डॉ. आरएल सुमन बताते हैं कि 18 वर्ष तक के बच्चों में हृदय रोग अत्यंत खतरनाक होते हैं, क्योंकि इससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर पड़ता है। बच्चों में सांस फूलना, नाखूनों में नीलापन, वजन न बढ़ना और जल्दी थकान जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था के दौरान समय पर जांच बेहद जरूरी है। गर्भवती महिलाओं को नियमित अल्ट्रासाउंड और फीटल इको कराना चाहिए। बच्चों में बार-बार होने वाले गले के संक्रमण का तुरंत इलाज जरूरी है, ताकि हृदय के वाल्व खराब न हों। डॉ. सुमन ने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों को जंक फूड और मोबाइल की लत से दूर रखें। शारीरिक खेलकूद और संतुलित पोषण के लिए प्रेरित करें। समय पर पहचान और सतर्कता ही मासूमों को गंभीर सर्जरी और बड़े जोखिम से बचा सकती है।


