राजधानी को साफ-स्वच्छ बनाने के लिए 17 वर्ष पहले वर्ष 2008 में सीवरेज-ड्रेनेज बनाने की योजना बनी थी। सिंगापुर की कंपनी मैनहर्ट ने शहर को 4 जोन में बांटकर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की थी, लेकिन मामला विवाद में फंस गया। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद राज्य सरकार सीवरेज-ड्रेनेज प्रोजेक्ट पर काम कराने के लिए तैयार हो गई, लेकिन इस प्रोजेक्ट से ड्रेनेज को अलग कर दिया। सिर्फ सीवरेज का काम कराने की स्वीकृति दी गई। इसके बाद नगर निगम ने वर्ष 2015 में सीवरेज प्रोजेक्ट पर काम शुरू कराया। तत्कालीन नगर विकास मंत्री सीपी सिंह ने बजरा में इस प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया, लेकिन काम शुरू होने के 10 वर्ष बाद भी सीवरेज प्रोजेक्ट अधूरा है। गुजरात की एलसी इंफ्रा कंपनी सीवर लाइन बिछाने का काम कर रही है, लेकिन पिछले डेढ़ साल से काम लगभग बंद है। कंपनी की मांग पर नगर निगम ने सीवर लाइन का रूट बदलने का प्रस्ताव तैयार करके नगर विकास विभाग को भेजा है, लेकिन अभी तक इस पर स्वीकृति नहीं मिली है। प्लान बनाने से लेकर सीवरेज-ड्रेनेज के नाम पर अब तक करीब 300 करोड़ रुपए खर्च भी हो गए हैं, लेकिन इसका फायदा आम लोगों को नहीं मिला। अब शहर की नई सरकार पर शहर की 15 लाख की आबादी की निगाहें टिकी हैं। सीवरेज-ड्रेनेज बने, तभी शहर स्वच्छ किसी भी शहर के लिए सीवरेज-ड्रेनेज सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट होता है। जिस तरह सड़क विकास का पैमाना है, उसी तरह सीवरेज-ड्रेनेज प्रोजेक्ट शहर की स्वच्छता का मापदंड है। रांची नगर निगम ने कभी भी इस प्रोजेक्ट पर फोकस होकर काम नहीं किया। मैंने जब इस प्रोजेक्ट को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की तो कोर्ट के आदेश पर काम शुरू हुआ, पर अधिकारियों ने इस प्रोजेक्ट को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। इसलिए आज भी प्रोजेक्ट अधूरा है। जोन-1 के साथ अन्य 3 जोन में प्रोजेक्ट पूरा होगा, तभी शहर स्वच्छ होगा। 10 वर्ष में दो कंपनियों से नहीं बनवा पाए सीवरेज सिस्टम प्रोजेक्ट पूरा होने से फायदा: सीवर लाइन बिछने से जोन-1 के वार्ड नंबर 1 से 5 और 30 से 33 के अंतर्गत आने वाले करीब 100 मुहल्लों में स्थित घरों में सेप्टिक टैंक की उपयोगिता समाप्त हो जाती। घर में बने मल चैंबर की पाइप सीधे सीवर लाइन से जुड़ जाती। सेप्टिक टैंक भरने पर उसे साफ कराने की जरूरत नहीं पड़ती। वर्ष 2021: फरवरी 2021 में 218.87 करोड़ की लागत से एलसी इंफ्रा को बचे हुए काम को पूरा करने का ठेका दिया। मार्च 2023 में काम पूरा करना था, लेकिन अब तक मात्र 90 प्रतिशत काम हुआ है। ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल: राजधानी बनने के 25 वर्ष बाद भी रांची में ड्रेनेज सिस्टम नहीं बना है। नालियों के निर्माण पर अब तक 200 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद सभी नालियां एक-दूसरे से नहीं जुड़ी हैं। नगर निगम, पथ निर्माण विभाग, जिला परिषद, आरआरडीए अपनी सुविधा के अनुसार नालियां बनाकर छोड़ देती हैं। वर्ष 2015: ज्योति बिल्डकॉन को 356 करोड़ में जोन-1 के 9 वार्ड में सीवरेज के काम का ठेका दिया गया। 2 वर्ष में काम पूरा होना था, पर 3 बार कंपनी को एक्सटेंशन दिया गया, फिर भी मात्र 100 किमी सीवर लाइन बिछी। मात्र 200 घरों के सीवर लाइन जुड़े: अभी तक 200 घरों की ही सीवर लाइन एसटीपी से जुड़ी है। खेलगांव से बूटी मोड़ रूट के सीवर लाइन को इससे जोड़ा गया है। पंडरा, पिस्कामोड़, रातू रोड, कांके रोड, मोरहाबादी होते हुए बरियातू रोड में बिछाई गई सीवर लाइन को एसटीपी से नहीं जोड़ा गया है। मेन लाइन बिछाने का एनओसी नहीं मिल रहा है। वर्ष 2008: मैनहर्ट कंपनी ने शहर को 4 जोन में बांटकर सीवरेज-ड्रेनेज प्रोजेक्ट की डीपीआर तैयार की थी, लेकिन यह विवादों में फंस गया। वर्ष 2014 में सीवरेज-ड्रेनेज प्रोजेक्ट में संशोधन करते हुए ड्रेनेज हटा दिया गया।


