उदय ने कहा- मुझे नहीं बनना मेयर, फिर सीएम के समझाने पर माने

रांची नगर पालिका, डोरंडा नगर पालिका और वाटर बोर्ड को मिलाकर 15 सितंबर 1979 को रांची नगर निगम का गठन किया गया था। इसके बाद 1986 में पहली बार रांची नगर निगम का चुनाव हुआ। उस समय रांची में कुल 37 वार्ड हुआ करते थे। पार्षद ही मेयर व डिप्टी मेयर का चुनाव करते थे। चुनाव जीतने के बाद सभी बोर्ड का गठन नहीं हो पाया, क्योंकि बोर्ड के लिए 52 सदस्यों का कोरम पूरा होना अनिवार्य था। इसमें पार्षदों ने 5 सदस्यों का चयन नॉमिनेशन से किया था। अन्य सदस्यों का नॉमिनेशन सरकार की थी, लेकिन एक सदस्य का चयन नहीं हो पाया। इसके बाद एक ऑर्डिनेंस लाया गया कि 51 सदस्य का आंकड़ा पूरा होने पर भी बोर्ड का गठन किया जा सकता है। तब जाकर पहली बार 1989 में नगर निगम बोर्ड का गठन किया गया। मैं उस समय मेयर पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार था। सभी पार्षदों की सहमति भी थी, लेकिन कांग्रेस के कुछ बड़े नेता नहीं चाहते थे कि मैं मेयर बनूं। इसलिए मुझे आगे बढ़ने से रोकने की रणनीति बनी। कांग्रेस पार्टी की ओर से मेयर कैंडिडेट का चुनाव करने के लिए तत्कालीन बिहार सरकार के दो मंत्री सुखदेव प्रसाद व डुमर लाल बैठा को ऑब्जर्वर बनाकर रांची भेजा गया। दोनों मंत्री ने 1-1 पार्षद से सर्किट हाउस में बात की और फीडबैक लिया। अंतिम में मुझे बुलाया गया और कहा कि मेयर बनने के लिए जितने वोट चाहिए उससे 4 वोट अधिक आपके पास हैं, लेकिन पार्टी का निर्णय अंतिम होगा। इसके बाद बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री भागवत प्रसाद आजाद ने रांची के तत्कालीन डीसी सजल चक्रवर्ती को मैसेज दिया कि मुझे लेकर पटना आएं। डीसी अपने साथ मुझे लेकर पटना गए। वहां सीएम साहब ने कहा कि इस बार आप पीछे हट जाइए, किसी दूसरे को सहयोग कीजिए, अगली बार आप मेयर बनेंगे। मैं उनकी बात नहीं काट पाया। रांची आने के बाद पता चला कि कांग्रेस नेताओं ने उदय प्रताप सिंह को मेयर बनाने का फैसला किया है। उनकी छवि अच्छी थी, लेकिन वे मेयर बनने के लिए तैयार नहीं थे। काफी समझाने के बाद वे मान गए। इसके बाद नगर निगम बोर्ड की बैठक बुलाई गई। मेयर के लिए उदय प्रताप सिंह के नाम का प्रस्ताव रखा गया, जिसे सभी पार्षदों ने ध्वनि मत से स्वीकृत किया। इस तरह उदय प्रताप सिंह रांची के पहले मेयर बने। मेयर बनने के बाद उन्होंने रांची में जितने भी पार्क थे, उसके सौंदर्यीकरण की योजना बनाई, ताकि मनोरंजन के साधन मिलें। सड़क-नाली, साफ-सफाई का काम तेज हुआ। पहली बार लोगों को अफसरशाही से मुक्ति मिली थी। 90 के दशक में सालाना 7 लाख रुपए थी निगम की कमाई रांची के पहले मेयर रहे उदय प्रताप सिंह कहते हैं कि 90 के दशक में नगर निगम की कमाई काफी कम थी। मात्र 7 लाख सालाना कमाई थी। होल्डिंग-पानी के टैक्स की वसूली कम थी। कलेक्शन बढ़ाने के लिए सभी सरकारी संस्थानों को बकाया भुगतान का नोटिस दिया गया। उस समय सीसीएल के ऊपर 1.20 करोड़ बकाया था। नोटिस के बाद भी पैसा नहीं देने पर सीसीएल का पानी कनेक्शन कटवा दिया। इसके बाद सीसीएल ने हरेक माह 7 लाख रुपए बकाया देना शुरू किया। यह देख निगमकर्मियों को प्रत्येक माह की 2 तारीख को वेतन का भुगतान करने का निर्देश दे दिया। सफाईकर्मियों को उस समय 500 रुपया प्रतिमाह मिलते थे, मैंने उसे बढ़ाकर 1600 रुपए कर दिया।

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