पुलिस ने जिसे ‘हादसा’ बताकर फाइल बंद की, कोर्ट ने उसे माना आपराधिक लापरवाही

नदबई के चर्चित ट्रेन हादसे में दो नाबालिग छात्राओं की मौत के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस मामले को पुलिस ने महज एक हादसा बताकर रफा-दफा करने की कोशिश की थी, अदालत ने अब उसे सतही और दोषपूर्ण मानकर खारिज कर दिया है। पुलिस ने अपनी जांच के बाद आरोपियों में प्रधानाचार्य और वार्डन को पूरी तरह निर्दोष बताते अदालत में अंतिम रिपोर्ट पेश की थी, जिसे कोर्ट ने आरोपियों को बचाने का एक प्रयास माना है। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि पुलिस ने जांच के दौरान न केवल चश्मदीद गवाहों के बयानों को नजरअंदाज किया, बल्कि शिक्षा विभाग की उन प्रतिकूल टिप्पणियों को भी दरकिनार कर दिया। जिसमें सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की बात कही गई थी। यह हृदयविदारक घटना 20 सितंबर 2021 की सुबह करीब 7:30 बजे की है। शारदे छात्रावास की कक्षा 10 की दो छात्राएं, करिश्मा और काजल, स्कूल जाने के लिए रेलवे फाटक पार कर रही थीं। इसी दौरान वे जयपुर-आगरा ट्रेन की चपेट में आ गईं और दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। मृतका करिश्मा के पिता भूरा ने आरोप लगाया था कि यह छात्रावास प्रशासन की घोर लापरवाही है। जिसके बाद नदबई पुलिस ने इस घटना को महज एक अकस्मात दुर्घटना बताकर एफआर लगा दी थी। मामले की। केस की पैरवी चतरभान सिंह और श्रीरामकिशन गुर्जर ने की। अगली सुनवाई 26 फरवरी को, कोर्ट ने क्यों नकारी पुलिस की थ्योरी:- न्यायालय ने पाया कि पुलिस ने मुख्य चश्मदीद गवाह ज्योति (मृतका की बहन) के उन महत्वपूर्ण तथ्यों को दरकिनार कर दिया, जिसमें उसने स्पष्ट कहा था कि वार्डन उन्हें जानबूझकर पटरियों वाले रास्ते से ले जाती थीं। कोर्ट ने पुलिस की जांच को पक्षपातपूर्ण बताते हुए कहा कि पुलिस ने केवल औपचारिकता पूरी की और वास्तविक तथ्यों को दबाने का प्रयास किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सुरक्षित मार्ग अंडरपास मौजूद था, तब छात्राओं को पटरियों से ले जाना साधारण उपेक्षा नहीं बल्कि घोर आपराधिक लापरवाही है, जो धारा 304 भाग-II के तहत दंडनीय है।

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