भास्कर न्यूज | अंबिकापुर बसंत ऋतु के शुभागमन के उपलक्ष्य में तुलसी साहित्य समिति द्वारा स्थानीय केशरवानी भवन में सरस वासंती काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। शहर के प्रतिष्ठित शायर यादव विकास की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य, संवेदनाओं और बसंत के सांस्कृतिक महत्व को जीवंत कर दिया। कार्यक्रम का आरंभ मां वीणापाणि के पूजन और गीतकार कृष्णकांत पाठक की सुमधुर सरस्वती वंदना हे पाप-ताप की नाशिनी, मेरे सातों स्वर को संवार दे के साथ हुआ। इस अवसर पर महाकवि तुलसीदास कृत रामचरितमानस के साथ-साथ एसपी जायसवाल और बीडी लाल द्वारा रचित सरगुजिहा रामायण का संक्षिप्त पाठ भी किया गया। मुख्य अतिथि पूर्व व्याख्याता सच्चिदानंद पांडेय ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं को कुसुमाकर (बसंत) कहा है, जो इस ऋतु की श्रेष्ठता को दर्शाता है। वहीं, विशिष्ट अतिथि पं. रामनारायण शर्मा ने बसंत को नई ऊर्जा का प्रतीक बताते हुए इसे भगवान राम के जन्म और आर्य समाज की स्थापना जैसी ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़ा। गोष्ठी में कवियों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां दीं। इस दौरान मुकुन्दलाल साहू, माधुरी जायसवाल, बीडी लाल, रामलाल विश्वकर्मा और जयगुप्त ने अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधा। कवि प्रताप पांडेय के वासंती गीत महक रहा यूं हरसिंगार जैसे पहला पहला प्यार ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। वहीं, कविवर चंद्रभूषण मिश्र ने शृंगार रस की छटा बिखेरी। कवि अजय सागर ने मानवीय कर्तव्यों का बोध कराते हुए कहा गर फैसला तुम कर सको तो, जो गिरे उसको संभालो। कार्यक्रम का समापन अध्यक्ष यादव विकास की प्रेरक गजल से हुआ सातों सुर गाएंगे चिड़ियों को चहकने दो, जिंदगी की शिकायत को, छोड़ो भी रहने दो। महुआ के दरख्तों और कुदरत के नजारों को समेटे इस गजल ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया। कार्यक्रम में केके त्रिपाठी, दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव, लीला यादव, होल साय, ऊनी राजवाड़े, प्रमोद और मनीलाल गुप्ता सहित बड़ी संख्या में काव्यप्रेमी उपस्थित रहे। अंत में संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष माधुरी जायसवाल ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।


