राजस्थान में 15 लाख लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य:ढाई लाख महिलाओं की आमदनी एक लाख रुपए से ज्यादा पहुंची, सबसे ज्यादा उदयपुर की महिलाएं आत्मनिर्भर बनीं

गत वर्ष बजट में घोषित की गई लखपति दीदी योजना में अब तक प्रदेश की ढाई लाख महिलाओं को योजना से जोड़ा जा सका है। इनकी वार्षिक आमदनी एक लाख रुपए से ज्यादा हो गई है। योजना के तहत कुल 15 लाख महिलाओं को लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य रखा गया था। इनमें से ढाई लाख को लखपति दीदी बना दिया गया जबकि 14 लाख से ज्यादा को चिन्हित किया है। इन्हें आने वाले समय में राजीविका के तहत आत्मनिर्भर बनाया जाएगा। इन महिलाओं को एक-एक लाख रुपए का ऋण भी दिया जाएगा ताकि ये छोटे उद्योग धंधे स्थापित कर सके। अब तक आत्मनिर्भर बनीं महिलाओं में सबसे ज्यादा 19169 उदयपुर जिले की हैं। जबकि सबसे कम 2505 महिलाएं धौलपुर जिले की हैं। यह राजीविका के तहत अन्नापूर्णा रसोई, छोटे उद्योग धंधे, डेयरी पशुपालन व ड्रोन स्प्रे आदि से आय कमा रही है। दस हजार से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाले जिलों में बांसवाड़ा में 18543, डूंगरपुर में 16591, झालावाड़ में 12655, राजसमंद 14172, जोधपुर 10273 व बारां में 11072 का आंकड़ा है। वहीं, सबसे कम लाभान्वित करने वाले जिलों में सीकर में 2767, झुंझुनूं में 2607, हनुमानगढ़ में 3101, नागौर में 3804 शामिल है। अन्य जिलों में यह संख्या पांच से दस हजार तक है। एसएचजी से जुड़ी सदस्य को एक लाख का ऋण महिला सशक्तीकरण के तहत स्वयं सहायता समूह की महिला सदस्यों की आमदनी बढ़ाने के लिए यह योजना पहले केंद्र सरकार ने शुरू की थी। उसके बाद जहां जहां भाजपा सरकारें बनीं, वहां इसे लागू किया गया। केंद्र सरकार ने 8.64 करोड़ महिला सदस्यों को आर्थिक सहायता देने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इनमें करीब 15 लाख राजस्थान की हैं। स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ी महिलाओं को रोजगार व उद्यम के लिए वित्तीय मदद का प्रावधान है। ऐसी महिलाओं को एक लाख रुपए तक आसान लोन सरकार देगी। 15 लाख महिलाओं में से हर साल 3 लाख महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाएगी। मनीषा रसोई संचालित कर रहीं गीता बाजरे के बिस्किट से कमाई कर रहीं भरतपुर जिले के पथैना गांव निवासी मनीषा स्वयं सहायता समूह के जरिए अन्नपूर्णा रसोई चला रही है। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। खेती बाड़ी से ही घर का खर्चा चलाना पड़ रहा था। इस पर वह समूह में शामिल हुई और कृषि सखी बनी। इससे उसे हर महीने 1,500 रुपए मिलने शुरू हो गए। फिर अन्नपूर्णा रसोई शुरू करने के लिए करीब सवा लाख का ऋण मिल गया। अब वह सफलतापूर्वक रसोई चला रहीं हैं। गांव की महिलाओं को भी रोजगार दे रहीं हैं। इसी तरह जोधपुर जिले की गीता स्वयं सहायता समूह के अन्य सदस्यों के साथ पिछले एक साल से बाजरे के बिस्टिट बना रही हैं। उन्होंने बेकरी, पापड़ और अचार बनाने के प्रशिक्षण लिए। राजीविका के माध्यम से बिस्किट बनाने की मशीन लगा ली। अब कई कंपनियों व लोगों से ऑर्डर आने लगे हैं।

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