धार्मिक स्थान तो पवित्र ही होता है, जैसे अन्न का असर मन पर होता है, वैसा ही पहनावे का असर बुद्धि पर होता है। पहनावे से व्यक्ति का भाव बदल जाता है। क्या सनातन धर्म के प्रचारकों, कथावाचकों का ध्यान इस तरफ गया है? जरूरी है कि सनातन धर्म की बात करने के साथ ही सनातन धर्म और धार्मिक स्थानों के अनुकूल पहनावे की प्रेरणा भी दी जानी चाहिए। इसके लिए यह भी जरूरी है कि हमें धार्मिक और पर्यटन स्थलों के अंतर को समझना होगा। धार्मिक स्थानों में न तो व्यवहार दिखावे का हो न वस्त्र दिखावे के हों, सद्गुरु की प्रेरणा से सभी जगह सदाचरण जरूरी है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में सोमवार को यह बात कही। जगह के अनुकूल वस्त्र पहनने चाहिए महाराजश्री ने कहा कि आधुनिक दौर में दिखावे के वस्त्र पहने जा रहे हैं। पहनने वालों को यह समझना चाहिए कि हम कहां जा रहे हैं। क्यों जा रहे हैं। जहां हम जा रहे हैं और जो वस्त्र हम पहने हुए हैं, वह वस्त्र उस जगह के अनुकूल है भी या नहीं। बच्चे कोई भी वस्त्र पहनकर कहीं जाते हैं तो उनका चल जाता है, लेकिन उन्हें भी समझाना चाहिए, कि जगह के अनुकूल वस्त्र पहनने चाहिए, क्योंकि हमसे ही बच्चे सीखते हैं। पर जब विवाहिता युवतियां विदेशी कल्चर के वस्त्र पहनकर धार्मिक स्थानों पर जाती हैं तब बड़ा बेहूदा लगता है। अन्य संप्रदायों के लोगों से सीखें कि वे भले ही कहीं पर कैसे भी घूमते रहें पर अपने धार्मिक स्थानों पर जाते समय उनकी वेशभूषा वही होती है, जो उनके संप्रदाय ने लागू की है। देवी-देवताओं, गुरुओं की मर्यादा का पालन जरूरी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि हम फेंसी परिधानों का विरोध नहीं कर रहे परंतु इस बात का समर्थन भी नहीं कर रहे कि आप धार्मिक संस्थानों में बेढंगे पहनावे का प्रदर्शन करें। इसलिए अपने देवी-देवताओं, गुरुओं की मर्यादा का पालन करें। उनके सामने ऐसा कृत्य न करें कि शर्म भी शरमा जाए और आपको पुण्य की जगह पाप लग जाए।


