भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा रेड-नेप्ड (काला बाज) कुआकोंडा क्षेत्र में करीब 5 साल पहले 8 की संख्या में पहुंचे थे, अब इनकी संख्या बढ़कर करीब 20 हो गई है, जो नियमित रूप से गांव के बीच में पेड़ों पर बैठते हैं। इन पक्षियों को भगाने पहले लोगों ने पटाखे भी फोड़े पर फिर भी ये नहीं भागे और अब यहीं के हो गए हैं। काले बाज जिस पेड़ पर बैठ रहे हैं, वह पेड़ वह सूख रहे हैं। कुआकोंडा में 6 पेड़ सूख गए हैं। पक्षियों के जानकार ने बताया काले बाज अब बहुत कम बचे हैं, इनका इंग्लिश नाम रेड-नेप्ड है और और हिंदी में लाल-डब बाज या फिर भारतीय काला बाज कहा जाता है। जानकर ने बताया इन पक्षियों के बिड में ऐसिडेंटिक अधिक होता है, इसलिए ये जिन पेड़ों पर लगातार बैठते हैं वह पेड़ धीरे-धीरे कर सूख जाते हैं। डॉक्टर अनुराग शर्मा अर्निथो लॉजिस्ट ने बताया ऊंचे पेड़ों पर ये घोसला बनाते हैं, ये पक्षी झुंड में रहते हैं। कुआकोंडा के साप्ताहिक बाजार स्थल के पेड़ों में ये पक्षी पिछले कई सालों से रह रहे हैं, जहां 4 पेड़ पूरी तरह से सूख गए हैं, 2 पेड़ जिसमें अभी इन पक्षियों ने अभी-अभी अपना घोसला बनाया है वह भी सूख रहे हैं। रेड-नेप्ड आइबिस, भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी इलाकों में पाए जाते हैं : ये पक्षी झीलें, दलदल, नदी के किनारे और सिंचित खेतों में पाए जाते हैं, ये पक्षी हरियाणा, पंजाब, और गंगा के मैदान में आमतौर पर पाए जाते हैं, रेड-नेप्ड आइबिस को इंडियन ब्लैक आइबिस भी कहा जाता है। इनका वैज्ञानिक नाम सिडिबिस पेपिलोसा है। ये पक्षी काले रंग के होते हैं, लेकिन इनके कंधों पर सफ़ेद धब्बा होता है और सिर और गर्दन के पीछे का हिस्सा लाल होता है।


