इन्होंने कैंसर को न सिर्फ हराया, अपनी कहानी से दूसरे मरीजों को दिया जीने का हौंसला

वर्ल्ड कैंसर डे (4 फरवरी) सिर्फ बीमारी की बात करने का दिन नहीं है, बल्कि उन लोगों को सलाम करने का मौका है, जिन्होंने कैंसर को कमजोरी नहीं बनने दिया। समाज में ऐसे कई चेहरे हैं, जिन्होंने इस बीमारी से जंग लड़ी, दर्द झेला, इलाज के लंबे दौर से गुजरे, लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारी। ये कहानियां बताती हैं, कैंसर से जिंदगी रुकती नहीं, बस देखने का नजरिया बदल जाता है। ऐसे ही दो कैंसर योद्धाओं की राह आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद बन चुकी है।​ दोनों ने अलग-अलग हालात, उम्र और परिस्थितियों में कैंसर का सामना किया। सर्जरी, कीमोथेरेपी और अनिश्चित भविष्य के बावजूद उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत रखा। इन योद्धाओं ने अपने अनुभव अपने तक सीमित नहीं रखे। जागरूकता फैलाई, मरीजों का डर घटाया। यह साबित किया कि सही जानकारी, सकारात्मक सोच और सहयोग से कैंसर के खिलाफ लड़ाई और मजबूत बन सकती है। 3 बार कैंसर से युद्ध, नहीं छोड़ी हिम्मत, अब लोगों का डर निकाल रहे साल 2010 में उन्हें पहली बार कैंसर ​का पता चला। यूरिनरी ब्लैडर में ट्यूमर था और पहले से ही प्लेटलेट्स कम रहने के कारण इलाज आसान नहीं था। हालात मुश्किल थे, लेकिन उन्होंने हार मानने की बजाय इलाज का सामना पूरे आत्मविश्वास के साथ किया। मुंबई में दो बार सर्जरी से गुजरे। साल 2013 में उन्हें टंग कैंसर डिटेक्ट हुआ, यह उनके लिए दूसरा बड़ा झटका था। फिर सर्जरी से सामना, पर उन्होंने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। डॉक्टर होने के नाते वे बीमारी को समझते थे, लेकिन एक मरीज के रूप में उन्होंने दर्द, डर और अनिश्चितता भी महसूस की। साल 2022 में तीसरी बार कैंसर डिटेक्ट हुआ और फिर सर्जरी हुई। तीन बार कैंसर से जूझने के बाद भी उन्होंने जिंदगी से समझौता नहीं किया। 2 साल कीमोथेरेपी भी ली, लेकिन बीमारी को अपने जीवन की दिशा तय नहीं करने दी। उन्होंने तय किया, उनके अनुभव सिर्फ उनके निजी संघर्ष तक सीमित नहीं रहेंगे। वे डायबिटीज और कैंसर संबंधी अवेयरनेस कैंप लगाते हैं। हेल्पलाइन नंबर भी है, जहां हर कैंसर मरीज को फ्री में सुना जाता है। समस्या का समाधान बताया जाता है। इस पहल से कई एक्सपर्ट्स जुड़े हैं। हजारों लोगों का मार्गदर्शन कर चुके। मरीजों के केस डिस्कस करते हैं, उनके मन से डर निकालने की कोशिश करते हैं। अपनी कहानी बताते है कि जब इरादा मजबूत हो, तो बीमारी भी इंसान की हिम्मत के आगे कमजोर पड़ जाती है।” -जैसा डॉ. सुरिंदर गुप्ता(69) ने बताया 5 बार कैंसर को हरा चुकीं, 9 दिन पहले फिर लंग कैंसर डिटेक्ट ‘2016 में यूटरस कैंसर को हराने के सात साल बाद 2023 में फेफड़ों के कैंसर की पहचान हुई। इलाज चला, सर्जरी हुई कीमो थैरेपी हुई और मैं फिर से स्वस्थ हो गई। लेकिन इसी साल जांच में ब्रेन ट्यूमर की पहचान हुई। इलाज चला, कई कीमो का दौर चला, रेडिएशन हुई और मैं फिर से कैंसर को हराने में सफल हो गई। 2025 में चैस्ट वॉल का कैंसर हुआ और उसके लिए ऑपरेशन करवाया। 2025 में ही सर्वाइकल स्पाइन कैंसर की पुष्टि हुई और दिसंबर में सर्जरी करवाई। डॉ. हरमन सोबती, डॉ. निशांत बत्ता और डॉ. कनुप्रिया भाटिया से इलाज चला। अब फेफड़ों में कैंसर का 25 जनवरी को ही पता चला है। उसके लिए भी एक कीमो हो चुकी है। कैंसर भले ही छठी बार आया है और मैंने अब तक 25 कीमो, 20 रेडिएशन करवाई हैं और दवाइयों का दौर अलग चलता है, लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी है। मैं हाउसवाइफ हूं। मुझे गार्डनिंग, पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट करना पसंद है। मैं अपना समय अपने शौक को देती हूं। सॉफ्ट टॉय बनाती हूं। हेल्दी खाना बनाना और सबको खिलाना पसंद है। कीमो से पहले भी और बाद में भी… मैं सबको खाना बना कर खिलाती हूं। मुझे खुशी मिलती है। मेरे पति अश्वनी जैन ने हर समय मेरा साथ दिया है। मेरे घर में मेरी सास, तीन बेटे, बहू और मेरा एक पोता है।’- जैसा नीलिमा जैन(53) ने बताया

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