वर्ल्ड कैंसर डे- खुद पीड़ित…मरीजों को भी देतीं हैं हौसला:ग्वालियर में 2 नर्सिंग ऑफिसर कहती हैं- हमे देखकर मरीजों को मिलती है प्रेरणा

कहते हैं, जब जान पर बन आती है तो इंसान सब कुछ छोड़ देता है, लेकिन इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो मौत से आंखों में आंखें डालकर हर दिन जिंदगी की जद्दोजहद करते हैं और साथ ही दूसरों के लिए उम्मीद की रोशनी भी बनते हैं। मध्यप्रदेश के ग्वालियर स्थित जयारोग्य अस्पताल समूह की कुछ नर्सें ऐसी ही मिसाल हैं, जो खुद गंभीर बीमारियों से जूझते हुए भी मरीजों की सेवा में कोई कमी नहीं आने देतीं। जयारोग्य अस्पताल समूह में हर दिन हजारों मरीज इलाज के लिए आते हैं और सैकड़ों मरीज भर्ती रहते हैं। इनकी देखभाल की जिम्मेदारी जहां डॉक्टरों पर होती है, वहीं नर्सिंग स्टाफ भी इलाज की रीढ़ होता है। इसी नर्सिंग स्टाफ में शामिल हैं राखी श्रीवास्तव और प्रेमलता माथनकर दो ऐसी नर्सें, जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद अपने कर्तव्य को जीवन से ऊपर रखे हुए हैं। खुद कैंसर से लड़ते हुए मरीजों को देती हैं हौसला हजार बिस्तर अस्पताल की सर्जरी यूनिट में पदस्थ नर्सिंग ऑफिसर राखी श्रीवास्तव पिछले कुछ वर्षों से ब्लड कैंसर से जूझ रही हैं। दवाओं और इलाज के सहारे वे न सिर्फ अपनी जिंदगी आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि आईसीयू जैसे संवेदनशील विभाग में मरीजों की सेवा भी कर रही हैं। राखी बताती हैं कि कई बार कैंसर से पीड़ित मरीज उन्हें देखकर हताशा से बाहर आ जाते हैं।

अध्यात्म और आस्था को बनाया ताकत राखी मरीजों को न सिर्फ दवाएं देती हैं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक सहारा भी बनती हैं। वे अपनी आस्था को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं। भगवान श्रीकृष्ण में विश्वास ने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया। राखी कहती हैं कि जब ईश्वर ने जीवन दिया है, तो उसे निराशा में क्यों गंवाया जाए। यही कारण है कि इलाज के अलावा उन्होंने कभी अतिरिक्त छुट्टी नहीं ली। पति ने कहा- छोड़ दो नौकरी राखी बताती हैं कि जब उन्हें बीमारी का पता चला, तो घर का माहौल बदल गया। उनके पति उन्हें लेकर काफी संवेदनशील हैं, इसलिए शुरुआत में उन्होंने नौकरी छोड़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अब आराम करो, लेकिन राखी का मन काम जारी रखने का था। राखी का कहना है कि घर में बैठकर हताश होने से बेहतर है व्यस्त रहना। पैसों की कोई कमी नहीं थी, फिर भी वे काम करना चाहती थीं। जब उन्होंने बॉम्बे में अपने डॉक्टर से फोन पर यह बात साझा की, तो डॉक्टर ने भी उनके पति को समझाया कि अगर राखी काम करना चाहती हैं, तो उन्हें करने देना चाहिए। इसके बाद पति ने सहमति दी और आज वे उनके सहयोग से जयारोग्य अस्पताल में सेवाएं दे रही हैं। मां बनने के 3 माह बाद कैंसर जयारोग्य अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग में पदस्थ स्टाफ नर्स प्रेमलता माथनकर की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं है। वर्ष 2020 में, जब उनकी गोद में तीन माह की बेटी थी, तभी उन्हें ब्रेस्ट कैंसर होने का पता चला। बीमारी ने उन्हें झकझोर दिया, लेकिन बेटियों और परिवार की जिम्मेदारी ने उन्हें हिम्मत दी। ग्वालियर में ही इलाज शुरू हुआ और करीब एक साल तक संघर्ष चला। 2023 में कैंसर ने दोबारा हमला प्रेमलता की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। वर्ष 2023 में कैंसर ने दोबारा हमला किया। इस बार लंग्स और बोन कैंसर के रूप में। अब तक वे 43 सेशन कीमोथैरेपी और रेडिएशन ट्रीटमेंट झेल चुकी हैं। लगातार दर्द, आर्थिक और मानसिक दबाव के बावजूद प्रेमलता अपनी ड्यूटी निभा रही हैं। दर्द को मात देती सेवा भावना जयारोग्य अस्पताल में ऐसी और भी नर्सें हैं, जो किसी न किसी बीमारी से जूझ रही हैं, फिर भी मरीजों की सेवा में जुटी हैं। राखी और प्रेमलता जैसी नर्सें साबित करती हैं कि अगर इंसान ठान ले, तो दर्द भी उसका हौसला नहीं तोड़ सकता। दूसरों के दुख को कम करने के लिए अपना दर्द भुला देना यही इन नर्सों की सबसे बड़ी इंसानियत और पहचान है।

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